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98.6 का समय गया, 97.5 अब शरीर का नार्मल तापमान है

98.6 का समय गया, 97.5 अब शरीर का नार्मल तापमान है


98.6 का समय गया

97.5 अब शरीर का नार्मल तापमान है

 

 

राजेश विक्रांत

 

 

कोविड-19 के युग में जब थर्मल स्कैनर व थर्मामीटर हमारे जीवन का अंग बन गए हैं और अब ज्यादातर दफ्तरों व बिल्डिंगों में शरीर के तापमान की जांच के बाद ही प्रवेश मिलता है तो यह भी जान लीजिए कि अगर आप सोचते हैं कि थर्मामीटर में 98 या 99 तापमान दिखाने का मतलब कि आपका शरीर नॉर्मल है तो अब ऐसा नहीं है। इस टेंपरेचरर का मतलब है कि आपका शरीर गर्म है और आपको बुखार है क्योंकि अब शरीर का सामान्य तापमान

97.5 बन गया है। जी हां! बरसों तक 98.6 डिग्री फारेनहाइट जादुई नम्बर था। पर अब नहीं रहा।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हालांकि वातावरण का तापमान हर रोज बढ़ता जा रहा है, लेकिन इंसान के शरीर का तापमान कम होता जा रहा है। 

98.6 का आंकड़ा जर्मन फिजिशियन कार्ल वेंडरलीच की देन है। सन 1851 में उन्होंने हजारों लोगों के एक मिलियन से ज्यादा तापमान का विश्लेषण कर स्वस्थ वयस्क के शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस यानी 98.6 डिग्री फारेनहाइट को औसत तापमान माना था। 

लेकिन तब से लेकर अब तक इसमें धीरे-धीरे कमी दर्ज की गयी है। इसके कई कारण हैं। पहला तो ये कि वेंडरलीच का थर्मामीटर आधुनिक थर्मामीटर से 2.9 से 3.2 डिग्री ज्यादा था। सन 1990 में मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर फिलिप मैरोविक ने पहली बार इस तथ्य को दुनिया के सामने रखा था। दूसरी बात कुछ अनुसंधानकर्ताओं ने अपने शोध के दौरान यह पाया कि सन 2000 में जन्मे पुरुषों के शरीर का तापमान सन 1800 में जन्मे पुरुषों की तुलना में औसतन 1.06 डिग्री फारेनहाइट कम है। इसी तरह, महिलाओं के मामले में भी अनुसंधानकर्ताओं ने यही बात नोट की है। सन 2000 में जन्म लेने वाली महिलाओं के शरीर का तापमान सन 1890 में जन्म लेने वाली महिलाओं की तुलना में 0.58 डिग्री फारेनहाइट कम था। ऐसे में शरीर के तापमान हर दशक में 0.03 डिग्री सेल्सियस यानी 0.05 डिग्री फारेनहाइट की कमी देखी जा रही है। 

दुनिया भर में हुई औद्योगिक क्रांति के कारण वातावरण में जो बदलाव आया, उसे भी इसकी वजह मानी जाती है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि सैनिटेशन यानी साफ-सफाई, डेंटल व मेडिकल केयर में हुए सुधार, देखरेख, दवाइयों व पौष्टिक आहार की उपलब्धता और घर के आसपास के माहौल की वजह से भी शरीर का क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन कम हुआ है। इतना ही नहीं, मॉर्डन हीटिंग और एयर कंडिशनिंग के इस्तेमाल से भी स्थाई तापमान और रेस्टिंग मेटाबॉलिक रेट में कमी आई है। ऐसे में आज के समय में परंपरागत 98.6 फारेनहाइट की जगह 97.5 फारेनहाइट शरीर का नॉर्मल तापमान बन गया है।

इसके लिए अनुसंधानकर्ताओं ने तीन डेटाबेसों का अध्ययन किया है। सबसे पहले, 1862 से 1930 के बीच 23,710 लोगों के शरीर के तापमान का अध्ययन किया गया। इसके बाद सन 1971 से 1975 तक एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया गया, जिसमें 15,301 लोगों के शरीर के तापमान को दर्ज का उसका विश्लेषण किया गया। वहीं, सन 2007 से 2017 तक स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने 150,280 लोगों पर अध्ययन किया। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में मेडिसिन की प्रोफेसर और इस अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका डॉ जूली पैरसॉनेट के मुताबिक, शारीरिक दृष्टि से देखें तो हम अतीत में जैसे थे उसकी तुलना में आज हम उससे काफी अलग हैं। हमारा वातावरण बदल चुका है, हमारे घर के अंदर का तापमान बदल चुका है, माइक्रोऑर्गैनिज्म से हमारा संपर्क बदल चुका है और हम जिस तरह के भोजन का सेवन कर रहे हैं, उसमें भी बदलाव आ चुका है।

शरीर का तापमान लिंग व उम्र पर भी निर्भर होता है। महिलाओं की तुलना में पुरुषों के शरीर का तापमान अधिक घटा है। जैसे कि महिला का आम तापमान पुरुषों से ज्यादा और बच्चों में वयस्कों से ज्यादा होता है। एक मजे की बात यह है कि इस पर समय का भी असर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर सुबह 6 बजे 99 तापमान असामान्य है पर यह अपरान्ह 4 बजे इसे सामान्य माना जाता है।

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