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और तब ग्वादर बंदरगाह भारत का होता !

और तब ग्वादर बंदरगाह भारत का होता !


  

          कैप्टन आर. विक्रम सिंह

 

       ...ये दुनिया का सबसे गहरा बलूचिस्तान में अरब सागर पर स्थित पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है. चीन का अत्यंत महत्वाकांक्षी सीपेक रोड प्रोजेक्ट जो काशगर काराकोरम से आता है वह यहीं आकर समाप्त होता है. यह एक लाख की बलोच आबादी का कस्बा था लेकिन अब चीनी इंजीनियरों, वर्करों व उनके सुरक्षा सैनिकों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. आज भारत चीन के सीमा विवाद के केन्द्र बने लद्दाख बालतिस्तान के पर्वतों से होकर गुजरने वाले  इस मार्ग पर चीन की निर्माण कम्पनियां तेजी से इस काम में लगी हुई हैं. यह चीन का वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग होने के साथ साथ यह भारत को घेरने का रणनीतिक मार्ग भी है.

   दिसंबर 1958 से पहले करीब 100 वर्षों तक ग्वादर ओमान का हिस्सा रहा है. 4 साल की पंचायत के बाद ग्वादर को ओमान से पाकिस्तान ने मात्र 30 लाख डालर अर्थात् 25 करोड़ भारतीय रुपये के बराबर की राशि देकर खरीद लिया. इससे पहले ओमान ने नेहरू सरकार को इसे बेचने का प्रस्ताव दिया था. नेहरू जी ने यह कह कर मना कर दिया कि भारत से बहुत दूर है. पश्चिमी से पूर्वी पाकिस्तान की 2200 किमी की दूरी जिन्ना के लिए अधिक नहीं थी. और हमारे लिये 500 किमी पर स्थित ग्वादर बहुत दूर था. भला हम कैसे सोच भी पाते ? हम तो रणनीतिक सोच से शून्य लोग थे जिन्हें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल मिल गयी थी. हमें क्या पता कि हमारे भविष्य के लिए ग्वादर कितना महत्वपूर्ण बंदरगाह है.

  यदि यह ग्वादर बंदरगाह भारत के पास होता तो हमारे लिये पाकिस्तान की नकेल कसना कितना आसान होता. आज सीपेक भारत के लिए एक खतरा है. अफगानिस्तान व मध्य एशिया के देशों से व्यापार के लिए ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत द्वारा विकसित किया गया है लेकिन यह चीनी संसाधनों का मुकाबला नहीं कर पायेगा.अब अगर भारत को घेरने वाली चीन की इस सीपेक योजना को विफल करना है तो भारत अमेरिका को एक संयुक्त रणनीति पर कार्य करना आवश्यक होगा. 

             बेहतर होगा यदि अमेरिका इंडो-प्रशांत क्षेत्र में भेजे जा रहे अपने  3 समुद्री युद्धक बेड़ों  में से एक को ग्वादर के निकट गुजरात के खंभात या किसी अन्य उपयुक्त स्थल पर कैम्प कराये. यहां से ग्वादर 500 किमी के अंदर ही है. हमारे पास समय कम है. अब और समय व्यर्थ किया गया तो यह हमारे लिए आत्मघाती सिद्ध होगा।

(लेखक बरेली के पूर्व जिलाधिकारी  व प्रख्यात चिंतक हैं) 

                                                               

(ग्वादर, अरब सागर का किनारा.)

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