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लालजी टण्डन: देहावसान पर विशेष

लालजी टण्डन: देहावसान पर विशेष


लालजी टण्डन: देहावसान पर विशेष 

 

दो वर्ष पहले अगस्त में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन को झकझोर कर रख दिया था. लखनऊ के हजरतगंज स्थित वे अपने सरकारी आवास पर अटल की स्मृतियों में खोए रहते थे. अटल के जाने के गम में घर पर भी सन्नाटा था. जो भी परिचित मिलने आता लालजी टंडन उसके सामने अटल बिहारी बाजपेयी के अनगिनत किस्सों का पिटारा खोल देते. उस समय पिछले पांच दिनों से छायी खामोशी अचानक हलचल में तब्दील हो गई थी जब 21 अगस्त, 2018 की दोपहर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन को बिहार का राज्यपाल बनाए जाने की घोषणा हुई. सभी कार्यकर्ता और नेता बधाई देने लालजी टंडन के आवास की तरफ दौड़ पड़े.

 

कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने आवास के बाहर ढोल-नगाड़े बजाने शुरू किये तो टंडन ने उसे फौरन बंद करा दिया. अटल से वियोग के गम में डूबे लालजी टंडन ने कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिलकर शुभकामनाएं तो लीं लेकिन उनके लाए गुलदस्ते और माला आवास के गेट पर ही रखवा ली थी. लखनवी पान टंडन की कमजोरी थी. हमेशा की तरह लखनऊ के परिवर्तन चौक से कमलेश चौरसिया शाम को बाबू जी यानी लालजी टंडन के लिए उनका पसंदीदा बिना सुपारी का सादा पान लाए थे. चौरसिया ने टंडन को अपने हाथ से पान खि‍लाया. चौरसिया कुछ उदास भी थे क्यों‍कि पिछले कई वर्षों से निरंतर पान खि‍लाने के सिलसिले पर कुछ समय के लिए विराम लगने जा रहा था.

 

मुंह में पान को दबाकर टंडन ने चौरसिया से कहा “लखनऊ से हमेशा के लिए विदा थोड़े हो रहा हूं. यहां आता रहूंगा. जब आऊंगा तुमसे ही पान खाऊंगा.” इसके बाद जब भी टंडन लखनऊ आए चौरसिया पान लेकर हाजिर हो जाते. करीब दो साल तक चले इस सिलसिले पर अब पूर्ण विराम लग गया है. अपनी जिंदादिली से कई विपरीत राजनीतिक परिस्थि‍तियों को काबू में करने वाले लखनऊ के बाबू जी यानी लालजी टंडन बीमारी से हार गए. लखनऊ के मेदांता अस्पताल में बीमारी से लंबे संघर्ष के बाद 85 वर्षीय टंडन ने 21 जुलाई की सुबह साढ़े पांच बजे अंतिम सांस ली. इस तरह लखनऊ का लाल अपने अनगिनत समर्थकों से हमेशा के लिए विदा हो गया.

 

वैसे तो लालजी टंडन के पूर्वज लखनऊ में सआदतगंज के निवासी थे लेकिन बाद में इनके पिता शि‍वनारायण जी सआदतगंज छोड़कर चौक के सोंधीटोला में आकर बस गए थे. चार भाईयों और पांच बहनों वाले लालजी टंडन की प्रारंभि‍क शि‍क्षा चौके के खत्री पाठशाला में हुई थी. फि‍र इन्होंने कालीचरण इंटर कॉलेज से पढ़ाई की. इंटर पास करने के बाद टंडन ने हिंदी, राजनीतिक शास्त्र और इतिहास विषय लेकर लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए पाठ्यक्रम में दाखि‍ला लिया. इसके बाद विधि‍ (लॉ) में भी दाखि‍ला लिया लेकिन वह परीक्षा नहीं दे सके. असल में टंडन शुरुआत से ही सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहते थे. इस कारण बीए में इनकी उपस्थिति कम हो गई थी और विश्वविद्यालय ने परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से मना कर दिया था. बाद में विश्वविद्यालय ने टंडन को परीक्षा में शामिल होने की विशेष अनुमति दी. अपने भाईयों में सबसे छोटे टंडन का विवाह वर्ष 1959 में सोंधी टोला में रहने वाली कृष्णा से हुआ था.

 

लखनऊ के चौक में किसी भी दुकान, पान की गुमटी से जाकर यह पूछना कि “बाबू जी के घर जाना है.” बिना देर किए लोग सोंधी टोला में लालजी टंडन के घर का पता बता देते हैं. चौके सोंधी टोला में रहकर टंडन ने अपने सामाजिक कार्यों की शुरुआत की. यहां गरीब परिवारों को किसी प्रकार की कोई समस्या होने पर टंडन फौरन हाजिर हो जाते थे. यह जनसंघ के संपर्क में आए. वर्ष 1952 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने. टंडन के सामाजिक कार्यों ने इन्हें चौक में लोकप्रियता दिलाई. यह वर्ष 1962 और 1967 में लखनऊ नगर महापालिका में सभासद चुने गए. वर्ष 1974 में टंडन लखनऊ पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से विधायकी का चुनाव महज डेढ़ हजार मतों से हार गए थे. इस दौरान ये लखनऊ महानगर जनसंघ के अध्यक्ष बने और जेपी आंदोलन के उत्तर प्रदेश में सहसंयोजक बने.

 

छह मई 1978 से पांच मई 1984 तक यह विधान परिषद के सदस्य रहे. इसके बाद दोबारा छह वर्ष मई 1990 से अक्तूबर 1996 में विधान परिषद सदस्य के साथ विधान परिषद में नेता सदन भी रहे. 24 जून, 1991 से छह दिसंबर 1992 तक प्रदेश की भाजपा सरकार में ऊर्जा एंव आवास, नगर विकास मंत्री बनाए गए. वर्ष 1995 में लालजी टंडन ने यूपी में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार बनवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. इसके बाद मुख्यमंत्री बनी बसपा की तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव मायावती लालजी टंडन को भाई मानते हुए इनके घर राखी बांधने पहुंची थीं. भाजपा और बसपा की राहें अलग होने पर यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक जारी नहीं रह पाया.

वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में टंडन ने पहली बार भाजपा के टिकट पर लखनऊ पश्चिम से विधानसभा सीट से विजय प्राप्त की. इसके बाद 21 मार्च 1997 से आठ मार्च 2002 तक तथा तीन मई 2002 से 25 अगस्त 2003 तक प्रदेश सरकार में आवास एवं विकास विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे. वर्ष 2009 में लालजी टंडन को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लखनऊ संसदीय क्षेत्र से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया. टंडन चुनाव जीते और सांसद बने. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में टंडन की जगह राजनाथ सिंह को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया. करीब चार वर्ष तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने वाले टंडन ने 23 अगस्त 2018 को बिहार के राज्यपाल की कुर्सी संभालकर खुद को दलीय राजनीति से मुक्त कर लिया. ग्यारह महीने बाद 29 जुलाई, 2019 को लालजी टंडन को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया. तबियत बिगड़ने के बाद लखनऊ के मेदांता अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होने पर 30 जून, 2020 को उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को मध्य प्रदेश के राज्यपाल के रूप में अतिरिक्त जि‍म्मेदारी दी गई.

 

सरल स्वभाव और कार्यकर्ताओं के लिए हर समय उपलब्ध रहने वाले लालजी टंडन का घर हमेशा कार्यकर्ताओं, समर्थकों और परिचितों से गुलजार रहता था. चाहे भाजपा की सरकार हो या विपक्षी दल की सरकार टंडन के दरबार की रौनक कभी कम नहीं हुई. उनके घर के दरवाजे सभी के लिए खुले थे. कोई भी व्यक्ति‍ अपनी समस्या लेकर टंडन के घर कभी भी आ सकता था. टंडन सभी की समस्या खुद ही सुनते और अपनी पूरी सामर्थ्य से उसे दूर करने का प्रयास भी करते. टंडन के इसी जिम्मेदाराना और संरक्षकरूपी व्यवहार ने इन्हें लोगों के बीच “बाबू जी” के रूप में लोकप्रिय बनाया था. टंडन सुबह लखनऊ के सोंधी टोला स्थिंत अपने आवास पर और शाम चार बजे के बाद त्रिलोकनाथ रोड स्थित सरकारी आवास पर उपलब्ध रहते थे. यहां पर आने वाले लोगों के लिए मठरी, चाय और लइया का इंतजाम रहता था. मंडली लगाना उनका शौक था.

 

लखनऊ की गलियां, खान-पान और रहन-सहन उनके दिलोदिमाग में बसा हुआ था. अपने दोस्तों और परिचितों को चाट या बाटी-चोखा की दावत देने के लिए टंडन हमेशा तत्पर रहते थे. वर्ष 2014 के बाद जब टंडन को सक्रिय राजनीति से कुछ समय मिला तो उन्होंने 'अनकहा लखनऊ' नामक किताब लिखकर लखनऊ के अतीत से लोगों का परिचय कराया. दो सौ पेज की इस पुस्तक में उन्होंने लखनऊ बसाने के संदर्भ दिए हैं कि लखनऊ का नाम पूर्व में लखनपुरी था. टंडन ने पुस्तक में इस बात के साक्ष्य भी पेश किए हैं कि लखनपुरी भगवान राम के भाई लक्ष्मण द्वारा बसाई गई थी. टंडन ने नवाबों के वंशजों को देखा था. अंग्रेजों की हुकूमत देखी थी. भारत को आजाद होते भी देखा था. किताब में इनसे जुड़े कई सारे तथ्य हैं. लखनऊ के खानपान, यहां की पारंपरिक दुकानें, रहन-सहन, कबूतरबाजी, गलियों और मोहल्लों के नामों के राज खोलने की कोशि‍श भी टंडन ने अपनी किताब के जरिए की थी.

 

 

टंडन को पक्षियों का भी बहुत शौक था. मंत्री रहने के दौरान टंडन कई बार लखनऊ के नक्खास स्थित पक्षी बाजार पहुंच जाते थे. टंडन जितने सरल स्वभाव के थे कामकाज में उतने ही कड़क थे. शहर के विकास में बाधा बन रहे अतिक्रमण पर उन्होंने नगर विकास मंत्री रहते बुलडोजर भी चलवा दिया था. टंडन ने कई प्रभावशाली लोगों के अवैध निर्माण जमीदोंज करवाए थे. इस वजह से उन्हें अपनी पार्टी में भी विरोध झेलना पड़ा था. लेकिन टंडन अपने निर्णय से पीछे नहीं हटे. इन्होंने आवागमन में बाधा बनीं चौक की दो बुर्जियां भारी विरोध के बीच रात के वक्त बुलडोजर से गिरवा दी थीं.

 

लालजी टंडन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे करीबी लोगों में से एक थे. टंडन केवल 14 साल के थे जब संघ के जरिए वह अटल से मिले थे. उसके बाद अटल सदैव लालजी टंडन के साथ पिता, बड़े भाई और मित्र की तरह रहे. टंडन ने वर्ष 1954 में लखनऊ के पहले लोकसभा उपचुनाव में अटल का चुनाव का प्रबंधन संभाला था. वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी लखनऊ से उम्मीदवार थे. तत्कालीन आवास एवं नगर विकास मंत्री लालजी टंडन अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव संभाल रहे थे. सड़कें चौड़ी कराने की वजह से टंडन का काफी विरोध हो रहा था. शि‍कायतें अटल तक पहुंची तो उन्होंने टंडन से हंसते हुए कहा “तुम मुझे चुनाव हरवा दोगे क्या...”. इस पर टंडन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “एक बार और हार जाइयेगा. कोई पहली बार थोड़े ही है.” अटल और टंडन दोनों की इस मजाक को समझ रहे थे. अटल का स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद लखनऊ में उनकी राजनीतिक विरासत लालजी टंडन ने ही संभाली थी.

 

मंगलवार 21 जुलाई की सुबह अनंत यात्रा पर निकल चुके लालजी टंडन अपने पीछे राजनीतिक सद्भाव, शुचिता और आम लोगों, गरीबों से जुड़ाव की जो विरासत छोड़ गए हैं उसे आगे बढ़ाना किसी के लिए आसान नहीं होगा.

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