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पाकिस्तान : एक भू-राजनैतिक अवरोध की तरह

पाकिस्तान : एक भू-राजनैतिक अवरोध की तरह


पाकिस्तान : एक भू-राजनैतिक अवरोध की तरह है.

 

पाकिस्तान के बनने से Geopolitical power equation अर्थात् भूराजनैतिक शक्ति संतुलन में भारत की दृष्टि से जो सबसे बड़ी समस्या हुई उसे हमारे आजाद भारत के गांधीवादी नये नेतागण ने पूर्णतः अनदेखा किया. इसी सिलसिले में पाक अधिकृत कश्मीर की बात आती है. प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी की सोच में जब क्षेत्रीय रूप से शक्तिशाली, प्रभावशाली भारत ही नहीं था तो फिर यह दृष्टि भी कहां से आती ? 

      .      अब वह समस्या क्या थी जो पाकिस्तान के जन्म ने हमारे लिए उत्पन्न कर दी ? इसे समझा जाये. मानचित्र पर देखें. इस विभाजन ने हमें प्रभावी रूप से पूर्वी एशिया का देश बना दिया. भारत के अधिकांश सम्पर्क पश्चिम से रहे थे. अब वह सम्पर्क सिंध के समुद्र से लेकर कश्मीर सरहद तक आरपार पाकिस्तान के बन जाने से पूर्णतः बाधित हो गया. जो रहा सहा सम्पर्क का एक पर्वतीय मार्ग गिलगिट बालतिस्तान के माध्यम से वाखान कारीडोर से विकसित हो सकता था वह भी यहां ब्रिटिश षड़यंत्र के प्रभाव से इस क्षेत्र में पाकिस्तान को काबिज करा देने के कारण संचालन से पूर्व ही बंद हो गया. जाहिर है जब हमने स्कर्दू गिलगित के लिए सेनाएं ही नहीं भेजी तो यही होना था. फिर स्वयं के प्रयास से युद्धविराम भी ले आया गया. परिणामस्वरूप ईरान अफगानिस्तान  जो हमारी सीमाओं पर थे, अब बहुत दूर के देश हो गये थे.

      एक सशक्त जीवित शरीर के रूप में भारत की कल्पना करें. भारत जिसका सर कश्मीर पर और दक्षिण तक पैर सिमटते हुए जैसे किसी योगी के समान एक साथ हो गये हो, जो धुर दक्षिण में श्रीलंका को स्पर्श कर रहा है. बांई भुजा कंधे के साथ फैलकर बंगाल पार कर असम म्यांमार की सीमाओं तक फैली हुई हो. और दाहिनी सशक्त भुजा जो पंजाब से आगे अफगानिस्तान, गांधार व ईरान की सरहद तक थी, फिर सीमित होकर सिंधु के समानांतर हुई, वह कहां है ? अर्थात् पंजाब, जिसकी पांच नदियों के दामन में वेदों की ऋचाएँ लिखी गई थीं वह कहां है ? जिस्म का वह हिस्सा, वह मजबूत भुजा, 1947 में हमारी अक्षमता के कारण अंग्रेजों द्वारा तराश दी गई. इस जगह पर  शरीर के आरपार एक मजबूत प्लास्टर बांध दिया गया जिसे हम आज पाकिस्तान कहते हैं. जैसे कि किसी जार पर एक बड़ा सा कार्क लगा दिया गया हो.

    .. अब एक बार फिर कल्पना करें यदि यह क्षेत्र धर्मांतरण के बावजूद इंडोनेशिया के समान साझा सांस्कृतिक राष्ट्रीय सोच से वावस्ता होता तो फिर पाकिस्तान भी अलग देश न बना होता. इस भारत के संभावित भूराजनैतिक प्रभाव की शक्ति की कल्पना मात्र से आपको सिहरन होने लगेगी. तुलना में ईरान इराक सउदी अरब छोटे देश होते.  उनकी अर्थव्यस्थाएं भारत से आपूर्ति व्यापार सहयोग पर आश्रित होतीं. क्या तब अफगानिस्तान में रूसी दखल हो पाता ? क्या तालिबान जन्म भी ले पाते ? क्या ईरान इराक का 10 साल चला युद्ध भारत तीन माह से अधिक चलने देता? इतना तो तय है यदि भारत विभाजित न हुआ होता तो पश्चिम एशिया का इतिहास ही दूसरा होता. भारत का प्रभाव अन्य बाहरी शक्तियों को पश्चिम एशिया की तेल अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने से निश्चय ही रोकता. या उन प्रभावों को सशक्त क्षेत्रीय शक्ति होने के नाते सीमित तो कर ही देता. यह स्थिति, क्या विश्व को अब तक साम्राज्यों, प्रभाव क्षेत्रों में बांटने वाली शक्तियों को रास आती ? लेकिन जिन्ना और पाकिस्तान के विभाजन ने यह महान् संभावना समाप्त कर दी और पश्चिम एशिया को महाशक्तियों का अखाड़ा बना दिया. या यो कहें कि महाशक्तियों को तेल उत्पादक देशों पर अपना वर्चस्व कायम करना था इसलिए पाकिस्तान बना कर भारत की संभावित महत्वाकांक्षाओं पर एक बड़ा सा कार्क ठोक  पूर्ण विराम लगा दिया गया. अब यह स्पष्ट हो रहा है कि पाकिस्तान के पीछे ब्रिटिश सरकार की ही भूमिका थी. जिन्ना के रूप में उन्हें एक असंतुष्ट चेहरा मिला, जिसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया.

          मुझे नहीं लगता कि नेहरू समेत तत्कालीन गांधीवादी नेताओं ने कभी भारत व पड़ोसी देशों के मानचित्र को सामने रख कर इन समस्याओं पर निगाह भी डाली हो या चर्चा भी की हो. वे जिनका अभीष्ट सत्ता में पंहुच जाना ही था, वे सत्ता की कुर्सियों पर गांधी बाबा का नाम जपते हुए काबिज होकर ही अतिशय प्रसन्न थे. वे कहां इन बड़े सवालों से जूझते ? ईरान अफगानिस्तान सोवियत रूस के मध्य एशियाई इलाकों जो आगे चल कर  1989 के बाद देश के रूप में आ गये, जहां से गत इतिहास में हमारे गहरे व्यापारिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक सम्पर्क रहे थे वे अब मात्र औपचारिकता हो कर रह गये. पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक इस्लामिक देशों और हमारे बीच में बाधा के रूप में एक नकली व शत्रुताभाव वाला इस्लामिक देश पाकिस्तान बन जाने से अब हमारी राजनयिक क्षमताओं पर दबाव बहुत बढ़ने वाला था. हम उन तेल उत्पादक देशों के निकट पड़ोसी होने की सुविधा से दूर होकर अब किसी भी रूप में उनकी नीतियों को प्रभावित करने से पूरी तरह अक्षम हो गये. यह एक बहुत बड़ी समस्या पाकिस्तान के बनने से हमारे सामने उत्पन्न हो गई. 

        इसलिए पीओके की वापसी मात्र राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल नहीं बल्कि एक भूराजनैतिक आवश्यकता है. स्कर्दू, गिलगित का ही एकमात्र रास्ता था. स्कर्दू में आठ माह तक जम्मू राज्य की सेनाएं जूझती रहीं लेकिन भारतीय सेना पहुंची ही नहीं. वह इलाका पाकिस्तान को समर्पित कर दिया गया. स्कर्दू चला गया तो गिलगित और उससे आगे अफगानिस्तान का रास्ता खुलना ही नहीं था. पाकिस्तान बन जाने के असर को कम करने व अफगानिस्तान ईरान व पश्चिम एशिया तक सड़क मार्ग के संचालन की दृष्टि से स्कर्दू का विशेष महत्व था. यह महत्व 1971 तक भी नहीं समझा गया. समझा तब जाता जब हम शक्ति की भाषा बोलने में सक्षम होते. 1971 की विजय के बाद भी हमारा देश दुनिया में अहिंसक नीतियों वाला, क्षमाप्रार्थी प्रकृति का मुल्क ही बना रहा. हम तो वो हाथी थे जो ऊंट को देख कर भागने लगता है. अब चाबहार, इस पाकिस्तान अवरोध के पार जा सकने का एक प्रयास था जो इस कमी को एक सीमा तक पूरा कर सकता था. लेकिन वह भी ईरान के साथ हमारा मित्रता के स्तरों पर निर्भर था.

       आज हमने आजादी के 73 वर्ष बाद POK की वापसी का लक्ष्य नियत किया है. और Pok की बात कर रहे हैं. हां, अबतक जबानी खानापूरी जरूर करते रहे हैं. हमारे नेताओं में 1971 के बाद भी Pok की बात करने का साहस नहीं आया था. आज कम से कम हम चीन की आंख से आंख मिला कर बात करने वाले और Pok की वापसी का लक्ष्य तय करने वाले तो बन ही गये  हैं. कोरोना के बाद के विश्व राजनीति के संभावित समीकरण के मुताबिक इस वापसी की प्रतिज्ञा के जमीन पर उतरने की स्थितियां बनती दिखाई देंगी .... !

                      .           

( चाबहार व स्कर्दू के दृश्य.)

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