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दशहरा एक आशावादी सुखद और शाश्वत युद्ध।

दशहरा एक आशावादी सुखद और शाश्वत युद्ध।


दशहरा मानवता के लिए एक बहुत बड़ा संदेश है जिसमें यह सिद्ध होता है कि शक्तिशाली से शक्तिशाली व्यक्ति जिसका पूर्व का इतिहास सिर्फ विजय कह रहा हो और इंद्र के जीतने का रहा हो जो तीनो भवनों का मालिक हो जिसकी यश और कीर्ति ,पराक्रम और अलंघनीय हो लेकिन उसके द्वारा कोई भी कार्य बलात किया जाए और विशेष रूप से स्त्रियों पर उसकी इच्छा के अपमानित करना। शिक्षक,वैज्ञानिकों मनीषियों, ऋषि को प्रताड़ित किया जाए अथवा सत्ता का दुरुपयोग उसके और परिजनों के द्वारा किया जाए तो ऐसे मनुष्य के महान पराक्रम का अंत दृढ़ संकल्प अच्छी रणनीति सकारात्मक सोच और एक कमतर संगठन के द्वारा संपादित किया जा सकता है और ऐसे दुर्गम दुर्जय और अजेय मानेवाले योद्धा को सामान्य से सामान्य व्यक्ति अपने दृढ़ संकल्प और अपने सकारात्मक सोच के माध्यम से बुद्धि और रणनीति का प्रयोग कर उसे पराजित कर सकता है इसका स्पष्ट उदाहरण श्री रामचंद्र जी की  रावण के ऊपर विजय है   ।                      रामायण में जैसा रावण का चित्रण किया गया है काफी यथार्थ परक है रावण के 10 सिर थे जिसका तात्पर्य  उसका प्रभुत्व पृथ्वी के ऊपर नीचे ,चारों दिशाओं में और चारों दिशाओं के कोणों मतलब दसों दिशाओं में  फैला हुआ था ।उसके पास जो सूचनाएं आती थी वह दसों दिशाओं से आती थी इतना अच्छा उसका सूचना तंत्र स्थापित था।       ऐसे महाराजा से या ऐसे परम योद्धा से पार पाने के बारे में कोई सोच नहीं सकता था। रावण वेद का ज्ञाता था वह एक ऋषि की संतान था लेकिन उसने दिखने वाली भौतिक सत्ता को ही सब कुछ समझा जिसके कारण उसके अंदर अहंकार का मद भर गया था उसने ऋषि-मुनियों और अपरिग्रह करने वाले ब्राह्मणों के आध्यात्मिक और नैतिक विचारों का न सिर्फ उपहास उड़ाया बल्कि उनकी संस्कृति को मिटाने का पूरा प्रयत्न किया यहां तक की उनको शांति से अपना काम करने के अधिकार से वंचित किया। रावण के भाई खर दूषण उसकी बहन सुपनखा और उसके दूसरे भाई अहिरावण उसके पुत्र मेघनाथ का पूरा आतंक भारत राज्य में था। रावण  नियमों से बंधा नहीं था उसके विचार ही नियम थे, उसकी सोच ही कुल गुरू थी। उसे राजा दशरथ की तरह विश्वामित्र, गुरु वशिष्ठ के आने पर खड़े होकर स्वागत नहीं करना होता था वह अपने को ही समस्त शक्ति का केंद्र मान बैठा था। इससे पीड़ित प्रजा जन सिर्फ कामना कर सकते थे कि रावण का अंत हो लेकिन रावण की अद्भुत शक्तियों के कारण उन्हें यह लगता था कि इसका अंत संभव नहीं है इसलिए उन्होंने इस बात की प्रतीक्षा की कि वह कोई ऐसा कार्य करें जिससे  उसकी कीर्ति उसका यश मिट्टी में मिल जाए और वह कारण तब बना जब रावण ने छल पूर्वक सीता जी का हरण कर लिया। स्त्री का अपमान और स्त्री का हरण करना सभी संस्कृतियों में अत्यंत ही निंदनीय माना गया है।।            यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि आर्य एक सोच और विचारधारा थी जैसा कि विभीषण को असुर कुल में पैदा हुआ आर्य कहा जाता है और रावण के पिता विषेश्रवा ऋषि और आर्य थे लेकिन अपने कर्म और विचारधारा के कारण वेद से ऊपर अपने आप को समझने और भौतिक संसार को ही सब कुछ मानने के विचार के फल स्वरुप अपनी इच्छा को ही अंतिम कानून का दर्जा देने के परिणाम स्वरूप रावण को असुर या राक्षस कहा गया और उसकी विचारधारा पर चलने वाले अन्य राजाओं को असुर राजा की संज्ञा दी गई ।बाली को भी बहुत पराक्रमी और अपने सुरक्षा का स्वामी कहा गया है वही सुग्रीव को आर्यपुत्र और महावीर हनुमान को आर्यपुत्र कहा गया जबकि दोनों का कुल एक ही था स्पष्ट है कि असुर और आर्य के विवाद में सिर्फ विचारधारा का फर्क था ।प्रजाति ,कुल और वंश इस प्रकार की कोई बात वास्तव में नहीं थी और यह सिर्फ भ्रम है कि कोई आर्य और अनार्य भी हुआ करते थे। सिर्फ आर्य संस्कृति होती थी और जो उसको नहीं मानते थे उनको राक्षस कहते थे जो कि वह भी एक स्वच्छनंद विचारधारा थी।  उनके अत्याचारों को चित्रित करने के लिए और बड़े बड़े दांत ,बड़े बड़े सिर बिखरे हुए बाल इसका एक चित्रात्मक प्रयोग किया गया लेकिन दोनों समान रूप से मनुष्य थे। सिर्फ उनके शासन शैली में अंतर था। वहीं पर श्री राम और उनका पूरा कुटुंब सत्ता के छोड़ने, सत्ता को सेवा का स्वरूप मानने का प्रतीक है। जहाँ गद्दी के लिए संघर्ष नहीं होता जाएं इस बात की होड़ लगती है कि कौन ज्यादा त्यागी कहलाएगा। श्री राम श्री भरत या श्री लक्ष्मण या  शत्रुघन।।                                       राम इसलिए त्यागी थे क्योंकि उन्होंने राजा दशरथ के संकेत मात्र से चक्रवर्ती सम्राट बनने के दिन सिंहासन का परित्याग कर दिया ।भरत इसलिए महान है क्योंकि उन्होंने राज सिंहासन को ना सिर्फ ठुकराया बल्कि मन से सारे प्रयत्न किए कि श्री राम को वापस अयोध्या बुला दिया जाए और ऐश्वर्य के साथ महाराजा या चक्रवर्ती सम्राट कह लाने की बजाय निष्कलंक जीवन वह जी पाए इस बात को उन्होंने प्राथमिकता दी। भौतिक सुख के स्थान पर उन्होंने निष्कलंक जीवन को प्राथमिकता दिया और इतना ही नहीं बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने श्रेष्ठ रूप से  सिर्फ श्री राम की तरफ से राज्य का संचालन किया। लक्ष्मण इसलिए महान है कि उन्होंने पूरे जीवन का प्रमुख समय श्री राम और श्री सीता जी की सेवा में अर्पित कर दिया जैसा कि बचपन से ही उनकी माता ने उन्हें शिक्षित किया था कि वह श्रीराम का ख्याल रखेंगे तो विवाह के तुरंत बाद जंगल को प्रस्थान कर गए और श्री राम का जीवन उन्होंने अपनी तपस्या से सुगम बनाया।शत्रुघ्न इसलिए कि सीमाओं की रक्षा उन्होंने उस समय की जब अयोध्या का विस्तीर्ण राज्य अनाथ हो गया था ।  वनवास में ही राम का एक प्रकार का राज्याभिषेक हो चुका था इसलिए दरअसल वह एक बनवासी राजा थे और यह बात सबको पता चल गई थी पूरे आर्यावर्त में कि श्री राम ही अयोध्या के राजा हैं लेकिन वह अपने माता के और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए 14 वर्ष के वनवास में हैं उनकी तरफ से उनकी आज्ञा से श्री भरत राज्य का संचालन कर रहे हैं इसलिए आसपास के जो छोटे राजा थे जो सम्राट के अधीन  राजा थे या गोदावरी के किनारे बसे हुए छोटे छोटे राजा थे वह सभी लोग उनको चक्रवर्ती सम्राट के रूप में ही मान्यता देते थे। दक्षिण भारत के युद्ध में जबकि रावण तरुण था और वेग से प्रहार करता था राजा दशरथ को उसने पराजित किया था जिससे कि राजा दशरथ की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची थी लेकिन उसके पूर्व तक लंका के आसपास तक राजा दशरथ का राज्य था इसलिए वहां के राजा भी उनको अयोध्या के अधीन अपने आप को समझते थे इस कारण भी श्रीराम को एक महाराजा के रूप में  ही उनका उन्होंने सम्मान किया श्री रामचंद्र जी की पूरी रणनीति नीति पर आधारित थी , उनका लक्ष्य उनके सीता से अटूट प्रेम पर आधारित था लेकिन साथ ही साथ उनकी रणनीति और उनका कौशल जो छुपा रह जाता है वह भी देखने लायक था। उन्होंने सभी सताए हुए ऋषियों जो कि तत्कालीन समय के शोध वैज्ञानिक थे उनके पास जाकर के उनकी प्रताड़ना को सुना और एक बनवासी राजा के द्वारा खुद पैदल जा कर के गांव में हर एक वासियों में, मल्लाहओ में और उन प्रताड़ित ऋषियों ,अपने पास धन का संरक्षण न करने वाले ब्राह्मणों की कुटिया में जाकर ऐसे आयुध और अस्त्रों को प्राप्त किया जो कि दुर्जेय थे। उसका प्रयोग ऋषि नहीं कर सकते थे लेकिन ऋषि चाहते थे कि एक अधिनायकवादी सत्ता  जो रावण के रूप में केंद्रित थी और वह कभी भी कहर बनकर टूट पड़ती थी उसका अंत हो ।वह सारे अस्त्र-शस्त्र श्रीराम ने हासिल किया आप देखेंगे कि श्री रामचंद्र जी वन में पशुओं की रक्षा के लिए कुछ तीर और धनुष का साथ लिए थे। लेकिन अमोघ अस्त्र उनके पास अयोध्या के राजा प्रासाद से लेकर नहीं निकले थे । इसके लिए उन्होंने ऋषियों से आशीर्वाद प्राप्त किया उन सारे लोगों ने अपने अस्त्र-शस्त्र आभूषण ,आध्यात्मिक शक्तियां उन्हें प्रदान किया । सेना की तैयारी के बाद उन्होंने देखा कि रावण का रिश्तेदार और उसका एक रिश्तेदार जो बहुत ज्यादा पीड़ित था सुग्रीव और उसे बालि ने असुर नीति के प्रभाव में उसकी स्त्री और उसका राज्य से उसको भगा दिया गया था ।उसकी स्त्री का भी हरण कर लिया गया था तो इस मार्मिक चोट को सहन करने वाले सुग्रीव से उन्होंने दोस्ती की उन्होंने इसके ऊपर पूरा भरोसा किया और जब उन्होंने देखा कि बाली के मारे जाने के बाद सुग्रीव वहां का राजा बन गया और वह भोग विलास में व्यस्त हो गया तो उसको लक्ष्मण जैसे महान योद्धा को चेतावनी देने के लिए भी भेजा रावण के विरुद्ध संघर्ष में सुग्रीव का साथ देना, साथ चलना ,वहां की पूरी सेना जामवंत जैसे बुद्धिमान युद्ध कौशल के निपुण व्यक्ति का   सेनापति और एक सहायक सेनापति के रूप में स्थापित होना रामायण में बहुत बड़ा निर्णय था और जो दक्षिण भारत के राज्य थे वह भी श्री रामचंद्र जी के साथ हुए और हर मनुष्य मानता था कि रावण ने सीता जी का हरण करके कायरता पूर्वक  गलत कार्य किया।  इस कारण से नैतिक रूप से जो रावण का समर्थन था वह न सिर्फ लोकमानस में खत्म हुआ बल्कि स्वयं श्रीलंका में भी उसके ही राज्य में बहुत सारे ऐसे मंत्री थे, बहुत सारे ऐसे बुद्धिमान लोग थे, स्वयं विभीषण ने और अन्य लोगों ने भी इसका विरोध किया। यहां तक कि रावण के नाना ने भी। रावण की माता ने भी बार-बार कहा कि तुम्हारा एक कदम गलत है क्योंकि रावण की जो यश ,कीर्ति या जो पराक्रम था यह कृत्य उसके पूरी तरह विपरीत था और क्योंकि देवता गण ऋषि- मुनि यह सब चाहते थे कि रावण का अंत हो।तो किसी अंहकारी सत्ता को समाप्त करने के लिए उसको  लोकमानस में  और अलोकप्रिय बनाना अब बहुत आवश्यक था। यह कार्य उसने खुद कर दिया सीता जी के हरण के साथ ।और उसका प्रचार प्रसार सभी आर्यों ने किया, सभी देवताओं ने किया, क्योंकि सभी प्रताड़ित थे ।  लेकिन  उसने अपने सत्ता के मद में उस अपयश को नियंत्रित करने की कोशिश किया। अपनी भूल को सुधार करने के स्थान पर उसने सब को चुनौती दे डाली। उसकी बहुत बड़ी भूल थी और दूसरा यह था कि शत्रु को छोटा समझना। उसने यह समझ लिया कि हमारे सामने  यह जो पैदल चलने वाले लोग हैं यह जो वनवासी के वेश में रहने वाला व्यक्ति है वह मेरा कुछ नहीं कर सकता।अधिनायकवादी सत्ता और इतना ज्यादा केंद्रित हो जाती है और अति आत्मविश्वास आ जाता है  जो उसके पराभव का कारण बनता है । ऐसे में  व्यक्ति के मस्तिष्क में  सूचना तंत्र होने के बावजूद, उसका उन्नत तकनीक होने के बावजूद, इस बात से बिल्कुल कट गया कि अगर वह बनवासी कहीं पर जा रहा है ।यज्ञशाला में जा रहा है तो वह सिर्फ कोई मंत्र लेने जा रहा होगा या वह आशीर्वाद लेने जा रहा होगा या आधुनिक अस्त्र। उन्होंने यह बहुत बड़ी भूल कर दी कि शायद जो तकनीक है जो युद्ध की के लिए जो शस्त्र हैं वह कहीं रावण के पास जो रखे शस्त्रों से ज्यादा आधुनिक थे।श्री राम ने आधुनिक शस्त्रों का उन्होंने प्रयोग किया। विभीषण के लात मारे जाने के बाद जब राम के चरणों में आता है तो लक्ष्मण जामवंत सहित जितने भी उनके सलाहकार थे सहायक सेनापति थे सब ने विरोध किया कि दुश्मन के कुल वंश के व्यक्ति पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन श्रीराम ने उनके सेना अध्यक्ष के रूप में यह विलक्षण निर्णय अपने विवेक पर लिया यह भी यह स्पष्ट होता है कि वह एक भावुक योद्धा नहीं थे बल्कि वह कुशल रणनीतिकार थे और एक सेनापति को एक सही निर्णय लेना चाहिए उन्होंने सबके मति के बावजूद जो निर्णय लिया वह सबसे अलग था लेकिन वह निर्णय सबसे ज्यादा निर्णायक हुआ उन्होंने एक अवसर के रूप में विभीषण को स्वीकारा। विभीषण को वहां पर समुद्र के पार उतरने की आज्ञा दी और उनसे उन्होंने मित्रता बढ़ाते हुए एक बात कह दी कि जब तक मैं हूं तब तक मैं आपके ऊपर आंच नहीं आने दूंगा। उनके ऊपर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला। सिर्फ विश्वास पैदा किया कि  कम नहीं बल्कि हम आपको प्राणों से ज्यादा प्रेम भी करते हैं ।इस वजह से यह इतना कारगर हुआ पूरे युद्ध में शायद सब कुछ करने के बावजूद रावण वास्तव में सफल होता विभीषण यदि नगर जो द्वार सबसे कमजोर था जो बाहरी दीवार थी उसका कौन सा द्वार सबसे कमजोर था । अगर यह ना बताया होता कि वहां के अंदर जो गोपनीय शस्त्रागार हैं वह कहां पर रखे हैं और उस पर आक्रमण करने से कितना फायदा हो सकता है तो दुश्मन को इतना चोट रामचंद्र जी ने उन रणनीतियों को ,अंदर की  गोपनीय नीतियों को जानकर , अंदर के भेद को जानकर किया, शायद यह यह युद्ध ऐसे नहीं होता।न जीता जाता   या तो जीता भी जाता तो बहुत नुकसान श्रीराम के पक्ष को उठाना पड़ता। इतना ही नहीं रावण के वध के समय में भी विभीषण ही काम आया और आप देखिए कि श्री रामचंद्र जी ने यह कहा कि भाई भाई को नहीं मारेगा क्योंकि दोनों के बीच में उन्होंने जान लिया था कि इतना भावनात्मक प्रेम है कि दोनों एक दूसरे के सामने खड़े होकर रो सकते हैं विभीषण से कुंभकरण का जितना आत्मिक लगाव था। बचपन से खेल खेलने से लेकर के पढ़ने से लेकर सारी चीजों की यादें बहुत भावनात्मक रूप से जुड़े जुड़े थी। सभी भाइयों में जो विभीषण और कुंभकरण का प्रेम था वह अद्वितीय था वह इस बात को जानते थे जैसे उनका भरत के साथ था अन्य भाइयों के साथ प्रेम था ,इसलिए उन्होंने वहां पर जाने नहीं दिया सिर्फ समझाने के सिवा ।दूसरा उन्होंने यह निर्णय लिया कि हनुमान जाएंगे ,उनसे लड़ने के लिए और उसके स्थान पर उन्होंने उनको यानी विभीषण को  अनुरोध के बावजूद उस दिन की लड़ाई में उनको जाना था नियम के अनुसार उसके बावजूद उनको वापस किया। कुंभकरण जान लिया  हम सिर्फ अपने राजा के लिए लड़ रहे हैं हम सच्चाई के लिए नहीं लड़ रहे हैं अत्यंत कारगर हुआ । श्री राम का जो जीवन है जो  संकल्प है जो रावण के ऊपर विजय है वह अधिनायकवाद के ऊपर एक सामान्य जन की पीड़ा की परम व्यक्ति है और उसका प्रभाव दिखाई देता है कि आज की तारीख में या जब तक मानवता रहेगी जब तक मनुष्य  इस पृथ्वी के ऊपर रहेगा याद रखेगा कि कोई भी सत्ता अपने आप को सर्व शक्तिमान नहीं समझ सकता ।न ही कोई शक्ति ऐसी  है जो खत्म नहीं हो सकती जो टूट नहीं सकती और कोई ऐसा सामान्य संगठन करता नहीं है अगर वह अपने त्याग और अपने पराक्रम और रणनीति के बल पर संगठन की क्षमता से  दूसरे लोगों को इकट्ठा करके उसके द्वारा प्रताड़ित लोगों को इकट्ठा करके अगर सेना का निर्माण करें तो वह बड़ी से बड़ी सत्ता को पराजित  कर सकता है।  केंद्रीय भूत सत्ता यानी अधिनायक वाली सत्ता होती है उसका दोष सबसे अधिक यह होता है कि वह बल को ही सब कुछ समझती है और आम जन भावना के विरोध से  वह नष्ट हो जाती है रावण के ऊपर रामचंद्र जी का विजय यह संदेश देता है कि किसी को भी निराश होने की जरूरत नहीं होती कोई कितनी भी कितनी भी विद्वान हो कोई कितनी भी बड़ी हो  सत्ता हो ,कितना भी बड़ा उसका सूचना तंत्र हो ,कितने भी बड़े अस्त्र हो, उसके पास कितना भी बड़ा धन भंडार  हो ।कितनी बड़ी सोने की लंका हो लेकिन वह ध्वस्त हो सकती है अन्याय के खिलाफ न्याय की लड़ाई का प्रतीक दशहरा आप सभी लोगों को प्रेरित करें और हम असत्य  के ऊपर सत्य, अहंकार के ऊपर विनय का लालच के ऊपर त्याग का ,घृणा  के ऊपर ममता और प्रेम का  विजय होते हुए देख सकें।.
(.लेखक..अरुण कुमार पांडेय बाल विकास परियोजनाधिकारी संघ
उ.प्र.  के अध्यक्ष हैं) 

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