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अन्नदाता की जय हो

अन्नदाता की जय हो


कोरोना काल में लाकडाउन के दौरान जब लोग अपने घरों में कैद थे तब सिर्फ एक ही वर्ग था जो कि खेत- खलिहानों में पूरी तरह से सक्रिय था। जी हां हम देश के अन्नदाता किसानों की ही बात कर रहे हैं। एक तरफ तो यह वर्ग सरकारी नीतियों से परेशान होकर धरना आंदोलन कर रहा था तो दूसरी तरफ इसने कड़ी मेहनत कर फसलों की बंपर पैदावार कर नया  रिकार्ड भी बना दिया।

साथ ही असंख्य किसानों ने अपने घर तथा अन्य स्थानों पर परेशान लोगों के लिए भोजन सामग्री तैयार कर बंटवाई भी। अन्न भी पहुंचाया। कुछ किसान चुपचाप दवाईयां भी उपलब्ध कराते रहे।


भारतीय किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मैं भारतीय अर्थव्यवस्था में किसानों के योगदान से अच्छी तरह से परिचित हूँ। किसानों ने कोरोना काल में बहुत परेशानियां भी सहन की। हममें से सभी इस सच को मानते हैं  कि कृषि, भारतीय अर्थतंत्र की रीढ़ है। यह सच भी है कि पुरानी पाठ्यपुस्तकों में भी खेती यानी कृषि को भारतीय अर्थतंत्र की रीढ़ के रूप में मान्यता दी गयी थी।लेकिन भारतीय (राज) नीति के  आधुनिकीकरण और शिक्षा के अति आधुनिकीकरण ने इस रीढ़ को राजतंत्र से बाहर कर दिया है। कोरोना वायरस की महामारी आने से पहले भी भारत में किसानों की आमदनी बहुत कम थी। देश में रूरल बैंकिंग की रेगुलेटरी एजेंसी नाबार्ड की तरफ़ से सन 2016-17 में कराए गए अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेश सर्वे में ये पाया गया था कि किसान परिवारों की हर महीने औसत आमदनी 8931 रुपए है और इसका तकरीबन 50 फ़ीसदी हिस्सा मज़दूरी और सरकार या किसी और का कुछ काम करके आता है।


कोरोना वायरस के संक्रमण को बढ़ने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण किसानों की आमदनी का ये हिस्सा बुरी तरह से प्रभावित हुआ। ये किसानों की ख़ुशनसीबी ही थी कि भारत में लॉकडाउन ऐसे वक़्त में नहीं लगा जब बुआई का सीज़न था, अन्यथा किसान वर्ग ज्यादा प्रभावित होता।

 

अब आप सोचिए कि जो वर्ग गांव-गांव में हरियाली पहुंचाने में योगदान दे रहा है। जो पूरी दुनिया को राशन मुहैया करा रहा है, उसकी दुर्दशा क्यों हो? 
कोरोना काल में इतिहास किसानों ने सेवा और समर्पण का इतिहास रचा है, वहीं भारतीय किसान मंच की पूरे देश मे फैली इकाइयों ने भी किसानों की भरपूर सेवा की है। हमने किसानों को राशन किट और भोजन मुहैया कराए, उनके लिए हेल्थ कैंप आयोजित किए। उनके लिए जागरूकता शिविर लगाए। उनकी समस्याओं को केंद्र व राज्य सरकार के सामने रखकर उनका समाधान करवाया। भारतीय किसान मंच मार्च 2020 में लगे लॉक डाउन से लेकर अब तक लगातार किसानों की सेवा व सहयोग में लगा हुआ है।  दुख तो यह भी है कि कुछ असामाजिक तत्वों को किसानों की, गऊ माता की सेवा पसंद नहीं आती, इसलिए मुझे  अनेक बार जानलेवा धमकियां भी दी गई हैं। लेकिन किसान सेवा का मेरा यज्ञ कभी रुकने वाला नहीं है।


( लेखक भारतीय किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

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