Image
ध्येय समर्पित बहुमुख प्रतिभा सम्पन्न हिन्दी सेवी आचार्य एस.ए.सूर्यनारायण वर्मा 

ध्येय समर्पित बहुमुख प्रतिभा सम्पन्न हिन्दी सेवी आचार्य एस.ए.सूर्यनारायण वर्मा 


ध्येय समर्पित बहुमुख प्रतिभा सम्पन्न हिन्दी सेवी आचार्य एस.ए.सूर्यनारायण वर्मा 
                       

डा.पी.के. जयलक्षमी
हिन्दी विभागाध्यक्षा  

संत जोसफ महिला  महाविद्यालय , विशाखापट्टनम

 दुखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतराग भयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता , सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निस्पृह है  तथा जिसके राग, भाय और क्रोध  नष्ट हो गए हैं , ऐसे मुनि स्थिरबुद्धि कहलाते हैं। उक्त भगवद्गीता का श्लोक हिन्दी के प्रति निष्ठावान आचार्य सूर्यनारायण वर्मा जी के चरित्र को उजागर करता है।  

राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रचार –प्रसार एवं श्रीवृद्धि के लिए तत्पर दक्षिण भारत के मूर्धन्य साहित्यकारों में आचार्य सूर्यनारायण वर्मा जी का अनन्यतम स्थान है। आंध्रप्रदेश स्थित विशाखापट्टनम में स्थायी रूप से निवासित हिन्दी भाषा एवं साहित्य के महारथी वर्मा जी मनसा वाचा कर्मणा  हिन्दी के लिए समर्पित कर्मयोगी हैं। वे हिन्दी के मौन साधक हैं और अपनी निस्वार्थ साहित्य साधना के बल पर उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु का काम कर रहे हैं। अपनी मौलिक एवं अनूदित कृतियों, चिंतन-मनन एवं नयी सूझ बूझ से वे एक नया कीर्तिमान स्थापित करते आ रहे हैं। 
 
आन्ध्रप्रदेश की सांस्कृतिक नागरी विजयनगरम के एक संभ्रांत क्षत्रिय परिवार में श्रीमति वरहालम्मा और श्री सागि रंगराजु के द्वितीय पुत्र के रूप में 23 मार्च 1956 को  आचार्य सागि अप्पला सूर्यनारायाण वर्मा जी का जन्म हुआ।   उनकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला मीन तेलुगु माध्यम से हुयी। तेलुगु भाषी वर्माजी को अपने गुरुजनों से हिन्दी सीखने की प्रेरणा बाल्य काल में ही प्राप्त हुयी।  अतः अपने मार्गदर्शक गुरु जनों के प्रोत्साहन से विभिन्न हिन्दी प्रचार सभाओं द्वारा संचालित हिन्दी परीक्षाओं को उत्तीर्ण कर उन्होंने अपने हिन्दी ज्ञान को बढ़ाया। इस पर भी उनकी हिन्दी –ज्ञान पिपासा शांत नहीं हुयी।  सन 1976 में जीव विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त करने के बाद उनकी रुचि हिन्दी साहित्य की ओर बढ़ गयी थी और उन्होंने  सन  1978 में विशाखापट्टनम के सुप्रसिद्ध आंध्र विश्वविद्यालय  से हिन्दी में  स्नातकोत्तर  उपाधि  प्रथम श्रेणी में प्राप्त कर ली।  उनका हिन्दी के प्रति यह लगाव उत्तरोत्तर बढ़ता  गया,  तत पश्चात उन्होंने हिन्दी विभाग के गंभीर विद्वान आचार्य अप्पलराजू जी के योग्य –निदेशन में छायावादी और भाव वादी कविता में प्रकृति चित्रण विषय पर शोध करके सन 1982 में पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की।  
 आचार्य वर्मा जी स्पृहणीय एवं अति विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी हैं। उनका  तेलुगु हिन्दी  तथा अङ्ग्रेज़ी पर समान अधिकार है।  इन भाषाओं का ज्ञान तथा  साहित्यिक ज्ञान ने उनके चिंतन-क्षितिज को नया आयाम एवं गति  प्रदान की है , जिनकी झलक वर्मा जी की समीक्षात्मक कृतियों में स्पष्ट दर्शित होती है। एक संवेदनशील साहित्यकार, विवेक शील आलोचक एवं प्रतिभा सम्पन्न अध्यापक के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य का अध्ययन –अनुशीलन  किया। सादा जीवन-उच्च विचार  का आदर्श प्रस्तुत करनेवाले  आचार्य जी हिन्दी तथा तेलुगु भाषा के साहित्य के उन्नयन एवं प्रगति के कार्यों में  सतत लीन हैं। लेकिन उनमें यश लोलुपता लेश मात्र भी नहीं है।  मृदु भाषी वर्मा जी आत्मस्थ व्यक्ति हैं और जीवन में उनका कोई शत्रु नहीं है। कर्मठ साहित्यकार वर्मा जी का न किसी के प्रति ईर्ष्या र्द्वेष है , न किसी के प्रति शिकायत। भगवद्गीता का यह श्लोक उनके विषय में  वाकई  सार्थक साबित होता है-

प्रजहाति यदा कामान्सर्वांपार्थ मनोगतान। आत्मन्येवात्माना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ 
दुखों में अनुद्विग्न, सुखों में निस्पृह और शुभाशुभ की प्राप्ति में हर्ष शोकादि द्वंद्वों से रहित पुरुष ही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। 
 उन्होंने सन 1979 से सन 1981 तक विजयनगरम के महाराजा महा विद्यालय में अध्यापन कार्य किया। तदनंतर  विशाखापट्टनम के सुप्रसिद्ध आंध्र विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में यू.जी.सी  सहायक के रूप में काम करके सन 1988 में यू.जी.सी  के अनुसंधान वैज्ञानिक बी पद पर नियुक्त हुये। तत्पश्चात 1993 में  पदोन्नति प्राप्तकर अनुसंधान वैज्ञानिक सी (आचार्य) बने।   ध्यातव्य है कि समूचे दक्षिण भारत के विश्व विद्यालयों में अल्पायु में इतना उच्च पद संभालनेवाले संभवतः वर्माजी ही होंगे। उनका बहु आयामी व्यक्तित्व रहा। वे एक सफल अध्यापक, दूरदर्शी लेखक, प्रभावी समीक्षक तथा सुयोग्य अनुवादक हैं।  वर्माजी एक अनुसंधित्सु अध्यापक रहे। उन्होंने अभी तक 30 पीएच.डी तथा 18 एम.फिल के शोधार्थियों का सफल मार्ग-दर्शन किया है। अपने निदेशन में शोधोपाधियाँ प्राप्त  विद्यार्थियों को नौकरी दिलाने हेतु  उन्होंने  कई परियोजनाओं का सूत्रपात भी किया। यही कारण है कि वे अपने शिष्यों तथा सहयोगियों के सदा श्रद्धा-पात्र रहे। भारत भर के कई विश्वविद्यालयों की  शिक्षा परिषद तथा पाठ्य ग्रंथ समिति के सदस्य, परीक्षक, शोध ग्रंथ –परीक्षक आदि रूपों में अपना निकट संबंध बनाए हुये हैं। साथ ही अपनी साहित्यिक सेवाओं के उपलक्ष्य में भारत सरकार के रक्षा विभाग  तथा रक्षा अनुसंधान विकास , भारतीय प्रशासनिक लोक  संस्थान , योजना तथा कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय  आदि में उन्हें हिन्दी सलाहकार पद पर नियुक्त किया गया।  

डॉ. वर्मा जी एक कर्मठ साहित्य सेवी के रूप में चार दशकों से लेखन कार्य में संलग्न हैं। सर्व प्रथम उन्होंने विश्व विद्यालय अनुदान आयोग , नयी दिल्ली द्वारा प्रायोजित पाँच शोध परियोजनाओं का अत्यंत कुशलता पूर्वक संचालन किया। देश भर की कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं, विशेषांकों, संस्मरिकाओं, अभिनंदन ग्रंथों आदि में उनके सैकड़ों प्रकीर्ण लेख प्रकाशित हुये हैं। डा. वर्मा जी एक निष्ठावान एवं सफल अनुवादक भी हैं। अनुवाद के लिए पुस्तकों के चयन में उन्होंने अपनी विशेष सूझ बूझ का परिचय दिया है। उन्होंने ऐसे ग्रंथों को प्राथमिकता दी है जो तेलुगु साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि के साथ साथ आंध्र के सामाजिक जीवन  एवं संस्कृति के दिग्दर्शक भी हैं। तेलुगु के प्रसिद्ध कवि बाल गंगाधर तिलक की कविताओं का उन्होंने हिन्दी में रूपांतरित करके एक रात जब बरसा अमृत नाम से प्रकाशित किया। तेलुगु के यशप्राप्त कहानीकार श्री केतु विश्वनाथ रेड्डी के साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली द्वारा  पुरस्कृत कहानी संग्रह का हिन्दी में रूपांतरित किया।  इनके साथ सर्व संभवम, कन्या शुल्कम, तेलुगु भाषा का इतिहास  आदि तेलुगु  के अन्य प्रसिद्ध ग्रंथों का हिन्दी में सफलता पूर्वक अनुवाद किया, जिनके लिए केंद्रीय हिन्दी संस्थान तथा केंद्रीय हिन्दी निदेशालय से अत्युत्तम पुरस्कार भी उन्होंने  जीत लिए।  वैसे ही हिन्दी के ख्याति प्राप्त कवि केदारनाथ कोमल की कविताओं का कविता कुसुमालु नाम से तेलुगु में पद्यानुवाद किया। इस प्रकार वर्मा जी ने अपने अनुवाद कार्य के माध्यम से तेलुगु साहित्य परिमल को सम्पूर्ण भारत में तथा हिन्दी साहित्य की उपलब्धियों को आंध्रों के समक्ष प्रस्तुत करने का स्तुत्य कार्य किया। स्पष्टतः उनके व्यक्तित्व की व्यापकता में आलोचक, लेखक, साहित्यकार, अनुवादक और रेखाचित्रकार की विशेषताओं का समाहार मिलता है। वर्मा जी के अनुसार आत्माभिव्यक्ति ही साहित्य का परम धर्म है।  

वर्मा जी के जीवन पर  उनके  पूज्य गुरु आचार्य पी. अप्पलराजू जी के व्यक्तित्व की अमिट छाप रही। पढ़ाई के दिनों में शिक्षार्जन के दौरान डा.राजू जी महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद  के कर्तृत्व के बारे में अक्सर विवरण देते हुये यह कहा करते थे कि चालीस वर्षों की  उम्र पार करने के बाद अपने जीवन में कुछ बनने या किसी भी क्षेत्र में अपनी क्षमता का निरूपण करने की  योजना बनाना मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं होगी।  वर्मा जी पर उनके और एक गुरु आचार्य आदेश्वर राव  का भी प्रभाव रहा जो कई हिन्दी, तेलुगु और अङ्ग्रेज़ी कवियों की पंक्तियों को सुनाते हुये समझाते थे कि  संवेदनशीलता और मूल्यधर्मिता  साहित्य का प्राण तत्व होता है। वर्मा जी का यह विचार है कि इन दोनों महानुभावों की  अदम्य प्रेरणा के फलस्वरूप  उन्होंने अध्ययन, अनुसंधान, मौलिक लेखन और अनुवाद के क्षेत्रों में अपनी साधना को जारी रखते समय थकावट को महसूस नहीं किया।  वे यह भी स्वीकारते हैं कि सारस्वत अनुवाद करते समय कई लेखकों के स्वस्थ विचारों से वे अवश्य प्रभावित हुये हैं। रामदर्श मिश्र , कमलेश्वर, महीप सिंह, राकेश वत्स आदि लेखकों  के विचार और उनकी  सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति की आचार्य वर्मा इतनी प्रशंसा  करते हैं कि इन लेखकों ने वस्तु का चयन, तथ्यों का निरीक्षण, एवं मानव मूल्यों की  समीक्षा करने में अपनी अलग पहचान बनाई है। इनके कृतित्व को आचार्य वर्मा  अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं। 

हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में वे इतने निष्णात हैं कि  उनके अध्यापन के दौरान शोधार्थियों , जिज्ञासु छात्र-छात्राओं तथा हिन्दी प्राध्यापकों का जमघट उनके इर्द-गिर्द रहा करता। वर्मा जी के व्याख्यानों से उनके गहन अध्ययन, विषय में गहरी पैठ का परिचय तो अवश्य प्राप्त होता है। विषय का इतना सम्यक, सारगर्भित तथा धाराप्रवाह श्रवण संभवतः कहीं अन्यत्र मिले। अपने छात्रों में सृजनात्मक भाव और ज्ञान का आनंद जगाना ही एक शिक्षक का सबसे महत्वपूर्ण गुण है।  इस कथन के जीते जागते प्रमाण हैं आचार्य वर्मा जी । वे अपने विद्यार्थियों के प्रति सदा एक संरक्षक की भांति सचेत रहते। अपने शोध कार्य  के दौरान छात्र न जाने कितने ही बार वक्त, बेवक्त उनके घर जाते और उनके कार्यों में विघ्न डालते, किन्तु 

आचार्य जी कभी रुष्ट नहीं होते, ऊपर से अपना काम छोड़, यथाशक्ति उनकी मदद करते। वे अनावश्यक बैठकबाजी में विश्वास नहीं रखते। लेखन में जल्दबाजी उनके स्वभाव में बिल्कुल नहीं है।  वे सदा यह मान कर चलते हैं कि मानव संबंधों के निर्वाह को महत्व देने में और दूसरों की  सहायता करने में हमें जो आनंद प्राप्त होता है  वह अमूल्य है।  हिन्दी के प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार आचार्य वर्मा जी नए से नए विषयों  और साहित्य में उनके समन्वय  या प्रस्तुतीकरण को साहित्य की श्रीवृद्धि मानते हैं। अतः उनके स्वागत करने में भी नहीं हिचकते । उनकी इसी विशिष्टता से प्रभावित छात्रों में वर्मा जी के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जागृत होना सहज ही है। उनकी एक और विशेषता यह रही कि वे किसी न किसी पुस्तक लेखन या शोध निदेशन में लगे रहे तो योजनाबद्ध ढंग से काम पूरा करते। वे अनुपम व्यक्तित्व के धनी ही नहीं बल्कि स्पष्टवादी और अनुशासन प्रिय भी हैं। 

सतत क्रियाशील हिन्दी प्रेमी डा.वर्मा जी में  परिस्थितियों से संघर्ष  करने की दुर्दमनीय क्षमता  और संकल्प की  दृढ़ता कूट कूट कर भरी है।  उनमें अनावश्यक वाचाल्य, आत्म प्रचारवाद अथवा निरर्थक आडंबर दिखाई नहीं देता।, बल्कि उनमें निरंतर सीखने की लिप्सा , आदर्शों और जीवन मूल्यों की सुगंध महकती रहती है।  वे जो कहते वही करते, जो करते उसीकी प्रेरणा दिया करते। उनका प्राध्यापकीय व्यक्तित्व विवादों से परे  स्वच्छ निर्मल और श्रेष्ठ मानवतावादी चिंतन प्रधान साहित्यिक संस्कारों से युक्त रहा। शांत चित्त और स्थित प्रज्ञ आचार्य वर्मा जी  हिन्दी भाषा और साहित्य के साथ भारतीय संस्कृति के संवर्धन में जुड़े रहे। उनकी चिंतन प्रक्रिया , शब्द चयन शैली  और वाक्य निर्माण अद्वितीय हैं। संवेदनशील वर्मा जी सब के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करते। जो भी उनके पास हिन्दी सीखने या शोध संबंधी शंका निवारण हेतु जाते, उनके प्रति उदारता व शालीनता दर्शाते।   
          
आचार्य वर्मा की प्रथम आलोचनात्मक कृति छायावादी और भाववादी कविता में चेतना (1985) के प्रकाशन के साथ ही काव्य संवेदना आलोचक की सहृदयता में स्फुरित हुयी। इस कृति के बाद द्विवेदी युगीन निबंधों में आधुनिक विचारधारा (1985) आलोचना संबंधी  उनका द्वितीय ग्रंथ है। तत पशचात उन्होंने हिन्दी और तेलुगु कविता में राष्ट्रीयता एवं सामाजिक क्रांति विषयों पर तुलनात्मक विश्लेषण संबंधी समीक्षा ग्रंथों का प्रणयन किया। उनकी  अन्य प्रकाशित रचनाएँ निम्नोक्त हैं- छायावादी कविता और भाव कविता में प्रकृति चित्रण, छायावादी और भाववादी कविता में  युग चेतना, द्विवेदी युगीन निबंधों में आधुनिक विचारधारा, कविता-कुसुम, अद्वैत वाद –एक अनुशीलन, नयी कविता और पुराख्यानों की प्रासंगिकता, स्वातंत्त्र्योत्तर  हिन्दी कविता का वस्तुगत अध्ययन, साठोत्तर हिन्दी और तेलुगु कविता में सामाजिक क्रांति, हिन्दी और तेलुगु कविता में राष्ट्रीयता, प्रेरक वाक्य, जब मैं ने साहित्य: विविध परिदृश्य,  लेर्निंग हिन्दी, तेलुगु भाषा का इतिहास, नयी कविता की काव्य संवेदना, सीतायन, जब मैं ने  तिरुपति बालाजी को देखा, आधुनिक हिन्दी साहित्य: मनन और मूल्यांकन, छायावादी कविता में युग चेतना,  आधुनिक तेलुगु, 19 वीं शती का भारतीय नाटक साहित्य और कन्याशुल्क । अब तक उनके 15 समीक्षात्मक ग्रंथ तथा 5 अनूदित ग्रंथों के साथ  विविध पत्र पत्रिकाओं में दो सौ आलेख प्रकाशित हुये हैं।
 
विद्या ददाति विनयम  निश्चय ही आपके विषय में सार्थक होती है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हुये भी आप हमेशा अपने गुरुजनों के प्रति, स्वजनों के प्रति यहाँ तक कि परिजनों के प्रति भी विनम्रता और उदारता दर्शाते हैं।  अपने पूज्य गुरुजनों –स्व. आचार्य. जी. सुंदर रेड्डी, स्व. आचार्य. पी. ए. राजू और आचार्य.पी. आदेश्वरर राव के मार्ग दर्शन को वे कभी न भूलते, प्रत्युत उनके पद-चिह्नों में चलना अपना गौरव मानते हुये स्वयं को उनका उपकृत मानते हैं।  हिन्दी के  प्रति कर्मठ  आचार्य वर्म जी अनेक छात्र-छात्राओं को शोध निदेशन के साथ साथ दिशा निदेशन भी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।  वे अहिंदी क्षेत्र विशाखपट्टनम  स्थित अपने विद्यार्थियों के मन में हिन्दी के प्रति रोचकता जगाकर और व्याकरण संगत शुद्ध हिन्दी सिखा कर उन्हें सुयोग्य शिक्षकों के रूप में ढालकर सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं  में स्थान प्राप्त करने लायक बना रहे हैं। इस प्रकार वर्मा जी अपने सब छात्र-छात्राओं के प्रति मित्र, दार्शनिक और मार्ग दर्शक जैसे पेश आते  हैं। 

कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का अवश्य योगदान होता है। वैसे ही  आचार्य वर्मा जी की सफलता में उनकी धर्म पत्नी श्रीमति झाँसी रानी का सम्पूर्ण सहयोग है। श्रीमति झाँसी रानी निश्चय ही एक सुयोग्य व शालीन गृहस्वामिनी हैं। घर परिवार की सारी जिम्मेदारियाँ खुद संभाल लेती हैं और वर्मा जी को कोई कमी या असुविधा नहीं आने देती। उनके वृत्तिगत या प्रवृत्तिगत जीवन में कोई विघ्न पड़ने न देतीं। वर्मा जी के सत्परामर्शों  के लिए निरंतर घर अनेवाले विद्यार्थियों तथा मित्रो का  वे मन से आवभगत करती है।  अपने पति के इष्ट ही उनका अभीष्ट  है। वे एक भद्र और संवेदनशील महिला है। मुझे लगता है शायद झाँसी जी के अभाव में  डा. वर्माजी इतने सफल साहित्यकार एवं समर्पित हिन्दी सेवी नहीं बन पाते। उनके इकलौता बेटा  फिलहाल स्टेट बैंक आफ इंडिया में अधिकारी  के पद पर  सेवा रत हैं।  अनुकूल वती पत्नी झाँसी रानी, समझदार सुपुत्र श्रीकांत, शांत सुशील पुत्र वधू रेणुका और  लाड़ली पोती साई मानसा के साथ वर्मा जी सुखमय पारिवारिक जीवन  जी रहे हैं। 
 तुलनात्मक अध्ययन और अनुसंधान के क्षेत्र में आचार्य वर्मा जी की उपलब्धियां राष्ट्रीय महत्व की हैं। अपने बहु आयामी लेखन के जरिये उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक संवाद को गतिशील बनाने में उत्कृष्ट योगदान के लिए वे अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए गए हैं।  ध्येय समर्पित हिन्दी सेवी तथा  बहुमुखी प्रतिभा के धनी  हिन्दी प्रचार –प्रसार एवं हिन्दी प्रशिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए राष्ट्रपति के करकमलों से केंद्रीय हिन्दी संस्थान के प्रतिष्ठित गंगा शरण पुरस्कार (2010) से सम्मानित किये गए।  साथ ही अपने श्रेष्ठ अनुवादों के लिए  केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा  एक लाख नकद पुरस्कार से सम्मानित हैं।   अपने व्यापक  एवं गंभीर अध्ययन, सतत लेखन,शोधपरक दृष्टि, दूसरों के प्रति आत्मीयता एवं सदाशयता आचार्य वर्मा के व्यक्तित्व के खास पहलू हैं। वे दूसरों के गुणों के पारखी हैं। कुछ दिनों में उनका जन्म दिन आनेवाला है। भगवान से प्रार्थना है कि वे हमारे पूज्य गुरू वर्मा जी को अच्छा स्वास्थ्य, सामर्थ्य , सुख, शांति  और  दीर्घायु प्रदान करें जिससे वे हिन्दी के प्रचार -प्रसार में और भी क्रियाशील और सक्रिय रहें। । जन्मदिन मुबारक हो सर।  आशा है कि भविष्य में भी आप कई नए कीर्तिमान स्थापित करें।  
 भगवद्गीता का  यह कथन आचार्य सूर्यनारायण वर्मा जी के  लिए सही प्रतीत होता है। 
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।  निर्ममो निरहंकार: सम दु:ख सुख: क्षमी । 

जो पुरुष सब प्राणियों से  द्वेष रहित तथा स्वार्थ रहित मैत्री और प्यार करते हुये, हेतु रहित करुणापूर्ण होता है  तथा ममता और अहंकार से रहित दुख और सुख के समय तटस्थ रहता है, साथ ही अपराध करनेवालों को भी अभय देता है – वे मुझे अत्यंत प्रिय होते हैं।

YOUR COMMENT

हमारे बारे में

नई पीढ़ी अपने विभिन्न अंकों के माध्यम से नये भारत व वर्तमान समाज के तमाम ज्वलंत सवालों पर न केवल बौध्दिक क्रांन्ति की अलख जगा रहा है वरन् उससे भी एक कदम आगे बढ़ कर ‘‘नई पीढ़ी फाउंडेशन’’ के माध्यम से एक सामाजिक नव जागरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। 'नई पीढ़ी फाउंडेशन' अपने विभिन्न मंचों (महिला मंच, अभिभावक मंच, शिक्षक मंच, पर्यावरण मंच) इत्यादि के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को नई पीढ़ी के नव निर्माण हेतु कार्य करने को प्रेरित कर रहा है। फाउंडेशन का एक मात्र उद्देश्य नई पीढ़ी को देश का सच्चा नागरिक बनने में सहयोग करते हुये मानव कल्याण के दिशा में प्रेरित करना है।

ON FACEBOOK

CONTACT US