Image
मातृशक्ति का सम्मान, बना राजनीति में आने का कारण

मातृशक्ति का सम्मान, बना राजनीति में आने का कारण


   (भोला जी की विशेष रिपोर्ट)

समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेताओं की निगाहें उस समय शर्म से नीचे जमीन पर गड़ी थी या नहीं, यह तो नहीं पता, परंतु बलिया की तमाम मां-बहनों की आंखें उस वक्त शर्म से जरुर जमीन पर गड़ गई थीं, जब जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में बलिया के सपा नेता अंबिका चौधरी के पुत्र आनंद चौधरी की जीत के जुलूस में उत्तर प्रदेश सरकार के एक कद्दावर मंत्री की बूढ़ी मां बहन को फूहड़ता भरी गालियों से नवाजा गया ।

  काश! मातृशक्ति को चौराहे पर जलील करने वाले इन लोगों को यह पता चल गया होता कि उपेंद्र तिवारी ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही उन्हीं जैसे लोगों की मां, बहन और बेटियों यानि मातृशक्ति के सम्मान में की थी, तो संभवत: वह सभी सिर शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब कर मर गये होते ।

र्ष 1990 के दशक में एक समय ऐसा आया जब पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्राओं की अस्मिता पर सवाल खड़े हो गए थे, विश्वविद्यालय की हजारों हजार बहन-बेटियां लोगों से निगाहें चुराने को मजबूर हो चली थी, छात्रावास के एक सेक्स स्कैंडल की आंच समूची मातृशक्ति के दामन को दागदार कर रही थी। एक महान विश्वविद्यालय का समूचा परिसर खामोश था, किसी भीष्म पितामह सदृश्य प्रोफेसर खामोश थेगदा और गांडीव का दम्भ भरने वाले पांडव रूपी छात्र नेता खामोश थे और इस चीर हरण के बीच यहां पर बहन बेटियों की निगाहें शर्म से जमीन पर गड़ी जा रही थी, ऐसे ही समय इन खामोशियों को तोड़ते हुये अपनी आंखों में अंगारा भरे परिसर का एक मामूली सा छात्र बहन बेटियों के सम्मान में उठ खड़ा हुआ, नाम था उपेंद्र तिवारी!

आखिरकार विश्वविद्यालय की छात्राओं के सम्मान में एक बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ और यह तब तक रूका जब तक विश्व विद्यालय की छात्राओं की गरिमा पुनः स्थापित ना हो गई

  

और फिर समाज के होकर रह गये उपेंद्र

बलिया जिले के बहुआरा बिगही नामक गांव के एक साधारण किसान स्वर्गीय विश्वनाथ तिवारी का यह सबसे छोटा सुपुत्र उपरोक्त घटनाक्रम के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में बदलाव चाहने वालों का नेता हो चुका था

  हालांकि श्री विश्वनाथ तिवारी ने बड़ी ही हसरतों के साथ अपने बेटे को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आईएएस और पीसीएस की तैयारी करने के लिए भेजा था। उपेंद्र तिवारी अपने मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए बहुत ही शिद्दत से मेहनत भी कर रहे थे लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।

  इस मौकापरस्त दुनिया में उपेंद्र की सबसे बड़ी कमजोरी यही थी कि वह अन्याय नहीं बर्दाश्त कर सकते थेऔर उनकी यही कमजोरी विश्वविद्यालय में बदलाव का सपना देख रहे तमाम छात्रों के लिए अन्याय के खिलाफ एक मजबूत ढाल कब बन गई यह बात खुद उपेंद्र को भी पता ना चली, और फिर जब उन्हें पता चली तो वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे थे

हलांकि बेटे और उसके संगी साथियों के इस चुनावी फैसले से उपेंद्र के पिता विश्वनाथ तिवारी कतई खुश नहीं थे, परंतु उपेंद्र के बड़े भाई दिनेश तिवारी ने उन्हें मना लिया था।

    इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में कदाचित ऐसा हैरतअंगेज अवसर बहुत कम आया है जब कोई छात्र नेता पहली ही बार के चुनाव में उप विजेता घोषित हो जाए! उपविजेता यानी सेकंड पोलर और सेकंड पोलर का मतलब था अगला उपाध्यक्ष  इलाहाबाद विश्वविद्यालय की यही परिपाटी थी, जो लगातार कई वर्षों से चली रही थी!

   उपेंद्र तिवारी जब पहले ही चुनाव में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ उपाध्यक्ष पद पर उपविजेता घोषित हुए तो तमाम आंखें खुश थीं तो कई आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं।

  दरअसल ऐसा हो भी क्यों ना क्योंकि उपेंद्र की शुरुआत से ही आदत रही कि वह जहां भी जिससे भी जुड़ते थे हृदय की गहराइयों से जुड़ते थे, अपने और अपनों के सम्मान के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया तथा उनका जुझारू तेवर ऐसा था कि अगर कहीं लग गए तो या तो आर या फिर पार।

   इन दिनों उपेंद्र तिवारी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर राजनीति करते रहे और फिर वर्ष 2002 में उन्हें कोपाचीट (अब फेफना) विधानसभा से भाजपा का उम्मीदवार घोषित किया गया

 

महारथियों के बीच फंसे अभिमन्यु सरीखा था उपेंद्र का पहला चुनाव

वर्ष 2002 में जब भाजपा से टिकट लेकर उपेंद्र तिवारी अपने विधानसभा क्षेत्र में पहुंचे तो चुनावी समर में उन्होंने खुद को चारों तरफ से बाहुबलियों से घिरा पाया

उनकी एक तरफ जहां बाहुबली और सपा के दिग्गज नेताओं में शुमार अंबिका चौधरी समाजवादी पार्टी से मैदान में थे, वहींदूसरी तरफ से बाहुबली और धनबली गोरखनाथ उपाध्याय कांग्रेस से ताल ठोक रहे थेतीसरी तरफ यूपी बिहार के बड़े शराब व्यवसाई और दबंग, बलिया जेल में बंद सुग्रीव सिंह ने अपनी बहू भारती सिंह को बसपा का टिकट दिलवाया था जो उस समय जिला पंचायत की अध्यक्ष भी थी इन महारथियों के चक्रव्यूह में एक मामूली से किसान के 26 -27 साल के नौजवान बेटे उपेंद्र तिवारी की स्थिति किसी अभिमन्यु की ही तरह थी!

हालांकि उन दिनों भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी उपेंद्र तिवारी को अपने दत्तक पुत्र की तरह सम्मान देते थे, लोगों के अनुसार यदि उपेंद्र तिवारी चाहते तो निश्चित तौर पर अपना चुनावी क्षेत्र में बदल सकते थे, बावजूद इसके, दबंगों की दबंगई से खून के आंसू रो रही क्षेत्रीय जनता के आंसुओं को पोंछना ही उनका सबसे बड़ा ध्येय था, इसीलिए उन्होंने चुनावी क्षेत्र बदले बिना कोपाचीट (अब फेफना) की क्षेत्रीय जनता को ही अपना भाग्य विधाता बना लिया था!

     इस चुनाव में उपेंद्र को छोड़कर उनके सभी चाहने वालों की धड़कनें बढी़ हुई थी, और जो दिल सर्वाधिक  धाड़-धाड़ कर धड़क रहा था वह था खुद उपेंद्र तिवारी के पिता श्री विश्वनाथ तिवारी का!

    श्री विश्वनाथ तिवारी केवल एक साधारण किसान थे बल्कि गांव के सीधे साधे इंसान थे वह जब मात्र 12 साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया, इस नाजुक उम्र में उनके कंधों पर अपनी बेवा मां के आंसू पोंछने के अलावा चार छोटे-छोटे भाइयों और एक बहन का भार भी गया था। जिसे उन्हें बड़ी ही कर्तव्यनिष्ठा से निभाया, जिम्मेदारियों की इसी निर्वहन के बीच उनकी पढ़ाई ना हो सकी थी।

इसलिए वह अपने सभी बेटों को पढ़ाना चाहते थे और इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्होंने  हांड़-तोड़ परिश्रम किया,  नतीजे में उनके सभी बेटे पढ़ लिख कर नौकरीपेशा से लग गए थे सबसे छोटा बेटा जिसे वह आईएएस बनाना चाहते थे वह नेता बन गया था और नेता भी ऐसा बना कि उन दबंगों के खिलाफ लोहा ले रहा है जिनका नाम सुन-सुनकर उन जैसे तमाम ग्रामीण अभी तक खौफ खाते रहे! वह उस दिन को कोसते रहते कि यदि मैंने अपने बड़े बेटों की बात ना मानी होती तो आज उपेंद्र को राजनीति में ना जाने देता!

पूरा क्षेत्र जहां चुनावी सरगर्मियों में खो चुका था वही श्री विश्वनाथ तिवारी इसी उधेड़बुन में खोए रहते कि मेरा नन्हा सा बच्चा इतने बड़े-बड़े दबंगों के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है वह इसे छोड़ेंगे नहीं!

 

गांव का साधारण मन इस बात को मानने से कतई राजी ना होता कि उनके नन्हे बच्चे उपेंद्र का जन्म ही बाहुबलियों से लोहा लेने के लिए हुआ है।  कुछ लोगों के समझाने से थोड़ा समझते लेकिन बीच-बीच में कुछ ऐसी  चुनावी अफवाहें आती कि उनका कलेजा फिर से कांपने लगता।

 

नामांकन के एक हफ्ते बाद उठा, सिर से पिता का साया

उपेंद्र तिवारी के नामांकन के अभी 1 सप्ताह ही बीते थे ऐसी ही किसी अफवाह ने विश्वनाथ तिवारी के हृदय की गति रोक दी थी।

पूरा परिवार अवाक और उपेंद्र तिवारी गहरे सदमे में थे पिता की अंत्येष्टि के बाद भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय जनता ने उन्हें समझाया कि अब आप परिवार से ज्यादा समाज के हैं इसलिए अब आप सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह कीजिए! वह दिनभर क्षेत्रीय जनता के बीच रहते तो थोड़ा पिता का गम भूले रहते लेकिन रात में जैसे ही वह घर पहुंचते उनकी आंखें फिर से किसी झरने की तरह बहना शुरू हो जाती थी! इन दिनों उपेंद्र तिवारी की आंख में आंसू थे और हाथ में समाज द्वारा थमाई गई तलवार, इस महाभारत में युद्ध ही एकमात्र विकल्प था बहरहाल इस युद्ध में अभिमन्यु की तरह  महारथियों के समक्ष उनकी पराजय हुई

 

बड़े भाई के त्याग ने दिया हौसला

 

जैसा कि ऊपर की पंक्तियों में बताया गया कि उपेंद्र तिवारी के पिता शुरुआत से ही अपने पूरे परिवार को संजो कर चले और यही गुण उन्होंने अपने पुत्रों में भी दिया! परिवार समाज को जोड़कर चलना उपेंद्र उनके भाइयों के खून में समाया था! इस घोर कलयुग में भातृत्व प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण कोई और ना मिलेगा कि जब उपेंद्र तिवारी अपना पहला चुनाव हार गए तो उनके बड़े भाई दिनेश तिवारी ने कहा कि अब दोबारा टिकट नहीं मिलेगा। तब उनके छोटे भाई उपेंद्र ने कहा कि मैं कर्म वादी व्यक्ति हूं, राजनीति और समाज सेवा को अपना कर्म बना चुका हूं , मैं अपने कर्म मार्ग पर डटा हूं और डटा रहूंगा। हां ! हमारे सामने चुनाव लड़ रहे बड़े-बड़े धनबलियों जितना पैसा हमारे पास नहीं है, यह दूसरी बात है

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक छोटे भाई उपेंद्र तिवारी की बात बड़े भाई दिनेश तिवारी के दिल में इतनी गहराई तक उतर गई। कि रेलवे में इंजीनियर की नौकरी छोड़कर बिजनेस खड़ा करने के लिए नोएडा चले गए, और छोटा सा बिजनेस धीरे-धीरे बढ़ाते हुए उन्होंने उसे एक बड़े बिजनेस में परिवर्तित किया।और फिर भाई से बोला कि तुम राजनीति करो, समाज सेवा करो, पैसे को लेकर कभी दिल छोटा मत करना!

 

जुझारू तेवर से भेदा महारथियों का किला

 बलिया की धरती ने उपेंद्र तिवारी को अपने अंक में पैदा तो कर दिया था,लेकिन अभी तक उनके बागी और जुझारू तेवर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने ही महसूस किया था संभवत इसीलिए नई सदी मे संघर्ष की  शुरुआत जब उपेंद्र तिवारी ने अपनी जन्म भूमि से  की तो बलिया के कुछ बाहुबलियों को यह लगा कि उनके किले को भेदना उपेंद्र तिवारी जैसे साधारण किसान के बेटे के बस की बात नहीं, लेकिन उपेंद्र ने जब लगातार एक दशक तक बलिया को मथना शुरू किया तो उसके गर्भ से विष भी निकला और विजय का अमृत भी

आखिरकार 16 वीं विधानसभा चुनाव में सपा के दबंग अंबिका चौधरी को उपेंद्र तिवारी ने उन्हीं के किले में पटखनी दे दी 

आसान नहीं थी डगर

 

वर्ष 2012 में अंबिका चौधरी के खिलाफ चुनाव लड़कर उपेंद्र तिवारी ने जीत तो हासिल कर ली थी लेकिन उनकी डगर इतनी आसान ना थी क्योंकि अंबिका सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के दाहिने हाथ कहे जाते थे और पूर्वांचल में मुलायम सिंह को वही गाइड करते थे, ऐसे में वर्ष 2012 में सपा की सरकार बनी तो चुनाव हारने के बावजूद अंबिका चौधरी को राजस्व , आपदा, बाढ़ जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय का मंत्री बनाया गया। बावजूद इसके उपेंद्र तिवारी ने बिना डरे, सपा की सरकार में सपा के ही मंत्री अंबिका चौधरी की पोल खोल अभियान शुरू कर दिया

इस दौर में अंबिका चौधरी और उपेंद्र तिवारी का प्रकरण विधानसभा में काफी गहमागहमी भरा रहा प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक एक दिन विधानसभा में आधे घंटे से अधिक समय तक अंबिका चौधरी उपेंद्र तिवारी पर आरोपों की बरसात करते रहे!

 उस वक्त भरी विधानसभा में उपेंद्र तिवारी की यह ललकार सभी ने सुनी कि 19 वर्षो के अंदर हाथी के दांत खाने के लिए कुछ और दिखाने के लिए कुछ और हैं,  उन्होंने अंबिका चौधरी को लेकर कहा कि अब गुंडईसीनाजोरी और भ्रष्टाचार बहुत हो चुका! सरकार मेरी भी जांच कराएं और अंबिका चौधरी की भी जांच कराए तो पता चलेगा कि जनता का असली गुनाहगार कौन है लोग बताते हैं उपेंद्र तिवारी के इस पोल-खोल अभियान के बाद ही सपा के मंत्री अंबिका चौधरी पर जांच बिठाई गई और उन्हें मंत्री पद से हटना पड़ा।

उपेंद्र तिवारी के हत्या की कोशिश और विनोद राय की शहादत

वर्ष 2002 में उपेंद्र तिवारी के पिता स्व. विश्वनाथ तिवारी जिस आशंका को लेकर दहशतजदा थे, वह घटना अगस्त 2016 में एक सच्चाई के रूप में सामने आई

बताते हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार में उपेंद्र तिवारी के एक कार्यकर्ता को फर्जी मामले में फंसाकर थाने में बंद कर दिया गयापरिणाम स्वरुप उपेंद्र तिवारी अपने समर्थकों के साथ थाने आ धमके, हालांकि उस समय उपेंद्र तिवारी विधायक थे बावजूद इसके उनके विरोधी सपा नेता के इशारे पर केवल उनके समर्थकों पर बल्कि खुद उपेंद्र तिवारी के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया

ऐसे में दरोगा के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर उपेंद्र तिवारी अपने समर्थकों के साथ थाने के सामने ही धरने पर बैठ गए दिन ढलने लगा रात के 9:00 बज गए थे, इतने में ही एक नेता के इशारे पर साजिशन उपेंद्र तिवारी समर्थकों पर लाठीचार्ज करवा दी गई, और भगदड़ के बीच उपेंद्र तिवारी के ऊपर फायरिंग कराई गई,परंतु जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि उपेंद्र तिवारी एक ऐसे नेता हैं,जो अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं और ऐसे में उनके इर्द-गिर्द हमेशा से ऐसे कार्यकर्ता भी मौजूद रहे हैं,जो अपनी जान की बाजी लगाकर भी अपने नेता की हिफाजत करना अपना सबसे बड़ा धर्म समझते थे।

 विनोद राय एक ऐसे ही कार्यकर्ता थे जो उपेंद्र तिवारी पर चलायी जाने वाली गोली अपने सीने पर खाकर शहीद हो गए। भारतीय राजनीति में यह बहुत कम देखने को मिलता है जब कार्यकर्ता अपने नेता से इतना प्यार करे कि उस पर लगने वाली गोली अपने सीने पर रोप ले।

फेफना से दूसरी जीत और मंत्री का पद

वर्ष 2017 में एक बार फिर फेफना की जनता ने उपेंद्र तिवारी को अपना विधायक बनाया  और योगी सरकार में ओपन तिवारी को राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार नियुक्त किया गया  बतौर मंत्री उन्हें पहली बार परती भूमि विकास एवं जल संसाधन विभाग में स्वतंत्र प्रभार दिया गया और कुछ ही वर्षो बाद  उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें युवा कल्याण विभाग और खेल मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई।

इस पद पर रहते हुए उपेंद्र तिवारी ने कई ऐतिहासिक कार्य किये हैं जिनका विवरण अगले पन्नों में पढ़ा जा सकता है।

कायम की उत्तर प्रदेश में  एक तेजतर्रार मंत्री की छवि

उपेंद्र तिवारी ने बहुत ही कम समय में  अपनी छवि उत्तर प्रदेश के एक तेजतर्रार मंत्री के रूप में स्थापित की,वर्ष 2017 में उन पर भरोसा करते हुए योगी सरकार ने उन्हें जल संपूर्ति, भूमि विकास एवं जल संसाधन, परतीभूमि विकास, वन एवं पर्यावरण, जंतु उद्यान, उद्यान, सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण विभागों में मंत्री का दायित्व सौंपा, इसमें जल संसाधन और परती भूमि विकास विभाग मे वह स्वतंत्र मंत्री थे,तथा अन्य विभागों में वह कैबिनेट मंत्रियों से संबद्ध थे। मंत्री बनने के पहले ही दिन उपेंद्र तिवारी अपने कार्यालय पहुंचते ही हाथ में झाड़ू उठा कर सफाई करने लगे,उनकी यह पहल स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देते हुए तमाम अफसरों मंत्रियों और आम जनता के लिए भी नजीर बन गई, मीडिया में इस बात की काफी चर्चा हुई।

उनसे संबंधित विभिन्न विभागों में उनके द्वारा ताबड़तोड़ छापों से संबंधित विभाग के अधिकारियों में खलबली मच गई लोग समय से ऑफिस आने लगे और उन्हें बखूबी पता चल गया कि अब पहले वाली सरकार नहीं रही, सरकार बदल गई है और अधिकारियों कों कार्यशैली भी बदलनी पड़ेगी।

इन सब के साथ ही उन्होंने धान क्रय केंद्रों पर छापेमारी कर वहां की रिश्वतखोरी को उजागर करते हुए अधिकारियों को सचेत किया, वहीं बिजली विभाग में छापा मारकर ट्रांसफार्मर बदलने के नाम पर ट्रांसपोटेशन घोटाले को उजागर किया, ट्रांसफार्मर के तार में कॉपर के तार की जगह चाइनीज तार का इस्तेमाल किया जा रहा है  इस बात को भी उन्होंने ही पकड़ा और बिजली विभाग में हड़कंप मच गया।

 

अपने पद पर पूरी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की मिसाल कायम करते हुए उपेंद्र तिवारी ने जहां एक तेजतर्रार मंत्री के रूप में अपनी छवि गढ़ी वही बागी बलिया का नाम भी ऊंचा किया उपेंद्र को करीब से जानने वालों के मुताबिक वह हमेशा से दिल के साफ आदमी रहे हैं, इसलिए सदैव सीधी सच्ची बात कह देना उनकी आदत हैं, अंजाम कुछ भी हो उन्हें अपने बयानों से मुकरते भी बहुत कम  देखा गया! यानी सीधा, सपाट और साफ।

 

 उपेंद्र तिवारी की यही निश्छलता वह कारण थी कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में सीधे युवा कल्याण और खेल विभाग  का महत्वपूर्ण महकमा थमा दिया! यहां भी उन्होंने अपने स्वभाव के अनुसार विभाग में काफी उत्कृष्ट कार्य किये, मेरठ में स्पोर्ट्स कालेज से लेकर, स्वामी विवेकानंद युवा पुरस्कार सम्मान सहित अनेकानेक कार्यों से वह युवाओं केके लिए उम्मीद की एक किरण बने हुए हैं।

 

क्या है अंबिका चौधरी और उपेंद्र तिवारी का विवाद

 

वैसे देखा जाए तो अंबिका चौधरी से उपेंद्र तिवारी की  कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है, लेकिन उपेंद्र को करीब से जानने वालों के मुताबिक उपेंद्र तिवारी का हमेशा से  अन्याय के खिलाफ मुखर होकर खड़े होने का संस्कार ही अंबिका चौधरी से उनकी अदावत की मुख्य वजह बना

  क्षेत्र के राम सजीवन बताते हैं कि भैया उपेंद्र तिवारी जब पहली बार क्षेत्र में आए तो उन दिनों पूरे इलाके में अंबिका चौधरी के गुर्गों की दबंगई का बोलबाला था, ऐसे में उपेंद्र तिवारी ने ही क्षेत्र की गरीब जनता के आंसुओं को  पोंछने का काम किया लगातार दस साल तक क्षेत्र में संघर्ष करने के बाद आखिरकार उन्होंने अंबिका चौधरी की तानाशाही भरी बादशाहत को उखाड़ कर क्षेत्र में जनता का राज कायम किया !

     वर्ष 2012 में जब पहली बार उपेंद्र तिवारी, अंबिका चौधरी को हराकर विधायक बने तो लोगों को लगा अंबिका चौधरी का कद अभी भी उपेंद्र तिवारी से बड़ा है,लेकिन 2017 में जब उपेंद्र तिवारी ने योगी सरकार के तेज तर्रार मंत्री के रूप में अपनी पहचान बनाई तब से अंबिका चौधरी  के सीने पर सांप लोटने लगा है

    राम सजीवन के अनुसार इस बीच पिछले दो दशक से अंबिका चौधरी के गुर्गे हाथ धोकर उपेंद्र तिवारी के पीछे पड़े हैं, अपमान का कोई भी मौका छोड़ने से नहीं चूकते। यहां तक कि कई बार उपेंद्र तिवारी को जान से मारने की कोशिश की गई, लेकिन उपेंद्र तिवारी के चाहने वाले लोगों की वजह से वह कामयाब नहीं हो सके!

 उन्होंने आगे कहा कि भीड़-भाड़ में गाली देकर भाग जाना अंबिका चौधरी के गुर्गों की पुरानी आदत है। क्योंकि वह जानते हैं कि आमने-सामने की लड़ाई हुई तो उपेंद्र तिवारी के समर्थक उन पर भारी पड़ेंगे। इसलिए वह पिछले कई वर्षों से दूर दूर से ही गाली देकर भाग खड़े होते हैं।

    यहीं पर अंबिका चौधरी के एक समर्थक "नई पीढ़ी" से हुई बातचीत के दौरान कहते हैं कि भैया गाली तो उपेंद्र तिवारी ने पहले अंबिका चौधरी को ही दी थी, उन्होंने अंबिका चौधरी को भरी सभा में कहा कि चौधरी ने कितने बाप बदले हैं कितनी मां बदली हैंइस पर उपेंद्र तिवारी के समर्थकों का कहना है कि उपेंद्र तिवारी ने इसमें गलत क्या कहा है? यह तो खुद अंबिका चौधरी ने ही कहा था कि पार्टी और मां-बाप बार-बार नहीं बदले जाते फिर अंबिका चौधरी बार-बार पार्टी क्यों बदल लेते हैं? आखिर अंबिका चौधरी का कोई ईमान धर्म है? आखिर वह कितनी बार पार्टी रूपी मां-बाप बदलेंगे? अंबिका चौधरी की यही बात उपेंद्र तिवारी ने घुमा कर कह दी फिर छौंका क्यों लग गया? उपेंद्र तिवारी के एक अन्य कट्टर समर्थक गुड्डू यादव "नई पीढ़ी" को बताते हैं कि भैया गालियों की भाषा हमें भी आती है लेकिन हम लोग इतने निकृष्ट नहीं है कि अंबिका चौधरी को गंदी - गंदी गालियां देकर अपनी जबान को गंदा करें । बहरहाल इस कथा को लिखते समय उपेंद्र तिवारी व अम्बिका चौधरी दोनों से ही "नई पीढ़ी " ने बात करने की कोशिश की लेकिन दोनों की व्यस्तता के कारण वार्ता संभव न हो सकी।

(उपरोक्त कवर स्टोरी जन चर्चाओं पर आधारित) 

YOUR COMMENT

हमारे बारे में

नई पीढ़ी अपने विभिन्न अंकों के माध्यम से नये भारत व वर्तमान समाज के तमाम ज्वलंत सवालों पर न केवल बौध्दिक क्रांन्ति की अलख जगा रहा है वरन् उससे भी एक कदम आगे बढ़ कर ‘‘नई पीढ़ी फाउंडेशन’’ के माध्यम से एक सामाजिक नव जागरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। 'नई पीढ़ी फाउंडेशन' अपने विभिन्न मंचों (महिला मंच, अभिभावक मंच, शिक्षक मंच, पर्यावरण मंच) इत्यादि के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को नई पीढ़ी के नव निर्माण हेतु कार्य करने को प्रेरित कर रहा है। फाउंडेशन का एक मात्र उद्देश्य नई पीढ़ी को देश का सच्चा नागरिक बनने में सहयोग करते हुये मानव कल्याण के दिशा में प्रेरित करना है।

ON FACEBOOK

CONTACT US