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सोशलाइजिंग

सोशलाइजिंग


सोशलाइजिंग

मेरी सोसायटी में अंकल थे।

मे उनको देखती आई हु।

उनको सोशलाइजिंग करना, लोगो के साथ बात करना अच्छा लगता था।

और क्यू ना हो? हमारा देश ही ऐसा है।

हमारे वहा बहोत से ऐसे तहेवार है जहा हम एक दूसरे से मिलते है।

या फिर यू कहिए की तहेवार बनाया जाता है एक दूसरे से मिलने के लिए।

हम कोशिश तो करते है अभी के माहोल में एक दुसरेसे मिलने के लिए चाहे फिर वो ज़ूम, गूगल या व्हाट्सएप ग्रुप कॉलिंग क्यू ना हो।

लेकिन यह एहसास आपको वोह एहसास नहीं दिलाता जब आप किसी को रूबरू मिलते है।

अक्सर हम सोचते है की, क्या हुआ अगर हम ज़ूम से बात करले या फिर गूगल मीट से जुड़ते है।

बात तो बात है।

लेकिन शायद हम हमारा कल्चर, या हमारा तौर तरीका भूल रहे है?

या फिर हम भी लोगो को कुल दिखाने की कोशिश कर रहे है?

लेकिन किसे?

जब वो अंकल  हमारे बीच नहीं रहे तो मुझे लगा की क्यू उन्हे बुरा लग गया होगा?

क्यू की माहोल ही कुछ ऐसा है की हम अक्सर अपने लोगों को टोकते है, की लोगों से न मिलिए।

में सोच रही थी की, उनको लोगो से बात करने देनी चाहिए थी।

तो शायद वो थोड़ी और सासे ले लेते और हमारे बीच रहे लेते।

हम अक्सर सोचते है की शायद लोगो मे समझदारी नहीं है। अभी माहोल ही कुछ ऐसा है की अभी नहीं मिलना चाहिए बाद में मिल लेंगे।

लेकिन शायद ये भी तो हो सकता है की किसी की सासें चल रही है इसलिए की क्यू की वो लोगो से मिल रहे है।

स्वास्थ्य तो एक बहाना है।

आज कल तो जानवर भी बीमार हो जाते है अगर हम उनसे नही मिलते, हम तो फिर भी इंसान है।

आपकी की क्या राय है?

तृप्ति शुक्ला-मुंबई

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