Image
फटे जूते।

फटे जूते।


फटे जूते।

मेने हरिशंकर परसाई  की प्रेमचंद के फटे जूते का एक व्यंग्य पढ़ा।

पढ़के मुझे पता चला कि व्यंग्य केसा होता है। और वोह समाज की व्यवस्था के उपर उत्कृष्टता से इशारा करता है।

चलिए आज की बात करते है।

हम नए जूते खरीदते है। अगर उस जूते में छेद हो जाता है तो हम उससे फेक देते है।

दरअसल समाज का आज भी एक वर्ग है जो जूते  में पड़े  छेद को सिलाता है।

और इसे वापस पहन

ने के योग्य बना देता है।

दरसल यह फटे जूते हमे क्या कहेना चाहते है?

या फिर यू कहिए की हम अपने आप से  क्या कहेना चाहते है।

मुंशी प्रेम चंद ने अपने फटे जूते पहेनके अपने व्यक्तित्व के साथ समझोता नही करने का इशारा कर दिया।

लेकिन क्या हम उस इशारे को समझ पा रहे है?

या फिर यू कहिए की हम अपने आप को तो दाव पे लगा सकते है लेकिन फटे जूते नहीं।

दरसल फटे जूते एक टेक है। वोह सचेत रूप से हमे इशारा करता है, तलवे या उगलिया भी क्यू ना घीस जाए, हमे अपने आंतरिक व्यक्तित्व के साथ छेड़खानी नही करनी चाहिए।

क्यू की शुरुआती दौर में तो ये हमे बहोत अच्छा लगता है। लेकिन शायद आप जानते नही यह बहोत समय लेगा हमे अपने व्यक्तित्व के साथ फिर से परिचित करने के लिए।

जूते एक बाह्य आडंबर है। उसका उपयोग आडंबर की तरह करना चाहिए। जैसे ही पता चले आडंबर हमारे व्यक्तित्व पे हावी हो रहा है,
तो उसे उस पल उसका पद दिखा देना चाहिए।

क्यू की जूते समाज का आईना है। जबकि आपका खुदका व्यक्तित्व आपका खुदा का आईना है।

चॉइस आपकी है।

तृप्ति शुक्ला - मुंबई

YOUR COMMENT

हमारे बारे में

नई पीढ़ी अपने विभिन्न अंकों के माध्यम से नये भारत व वर्तमान समाज के तमाम ज्वलंत सवालों पर न केवल बौध्दिक क्रांन्ति की अलख जगा रहा है वरन् उससे भी एक कदम आगे बढ़ कर ‘‘नई पीढ़ी फाउंडेशन’’ के माध्यम से एक सामाजिक नव जागरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। 'नई पीढ़ी फाउंडेशन' अपने विभिन्न मंचों (महिला मंच, अभिभावक मंच, शिक्षक मंच, पर्यावरण मंच) इत्यादि के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को नई पीढ़ी के नव निर्माण हेतु कार्य करने को प्रेरित कर रहा है। फाउंडेशन का एक मात्र उद्देश्य नई पीढ़ी को देश का सच्चा नागरिक बनने में सहयोग करते हुये मानव कल्याण के दिशा में प्रेरित करना है।

ON FACEBOOK

CONTACT US